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ग़ज़ल-तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?

2122       2122        2122        2

चुप रहीं आँखें सजल ने कुछ नहीं  बोला
इसलिए  मनवा विकल ने कुछ नहीं बोला

भाव जितने हैं सभी को लिख दिया हमदम
क्या कहूँ! तुमसे ग़ज़ल ने कुछ नहीं बोला?

जिस  किनारे  बैठ  के  पहरों  तुम्हें  सोचूँ
उस जलाशय के कमल ने कुछ नहीं बोला?

एक  पत्थर  झील में  फेंका कि जुम्बिश हो
झील के  खामोश जल ने कुछ नहीं  बोला

साथ 'ब्रज' के रात भर पल पल रहे जलते
जुगनुओं  के नेक  दल ने कुछ नहीं  बोला?
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 24, 2020 at 9:59pm

उचित ही कहा आपने आदरणीय समर जी...मतला कमजोर तो है।दरअसल पहले जो मतला था उसपे ध्यान न होने के कारण काफ़िया दोषपूर्ण था।तभी ये एडिट किया लेकिन कमजोर तो है।कुछ और कोशिश करता हूँ।आपकी उपस्थिति और मूल्यवान सलाह के लिए शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on November 24, 2020 at 5:15pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

मतला कमज़ोर है ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 22, 2020 at 12:36pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी ग़ज़ल पे आपकी उत्साहवर्धन टिप्पड़ी से हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हुआ।बहुत बहुत आभार...

Comment by TEJ VEER SINGH on November 20, 2020 at 6:30pm

हार्दिक बधाई आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी। बेहतरीन गज़ल।

एक  पत्थर  झील में  फेंका कि जुम्बिश हो
झील के  खामोश जल ने कुछ नहीं  बोला

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 19, 2020 at 11:28pm

आदरणीय चेतन जी आपने सही कहा बह्र लिखना मैं भूल गया।ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।जहाँ प्रश्न चिन्ह है वो शे'र प्रश्न ही हैं।

हाँ लेकिन मतले से ही काफ़िया दुरुस्त नहीं है..ये गलती हुई है जिसे सुधारना होगा।

Comment by Chetan Prakash on November 19, 2020 at 11:17pm

आदाब, भाई ब्रजेश कुमार ब्रज ! बेहतर होता कि आप ग़जल की बह्र और अरकान भी रचना के ऊपर अंकित करते। ! ऐसा होने से शिल्प की पड़ताल बेहतर हो सकती थी। वैसे, मुझे तय करना कठिन हो रहा है कि रचना को नाम क्या दूँ, कदाचित नज़्म कहना बेहतर होगा। एक और बात और, हर शेर के बाद प्रश्नवाचक चिन्ह से आपका क्या आशय है बंधु ,कम से कम, ये नाचीज नही समझ पाया ।

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