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आँगन वो चौड़ा खेत के छूटे रहट वहीं - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२


पूछो न आप गाँव को क्या क्या हैं डर दिये
खेती को मार  खेत  जो  सेजों से भर दिये।१।
**
पाटे गये वो ताल भी पुरखों की देन जो
रख के विकास नाम ये अन्धे नगर दिये।२।
**
आँगन  वो  चौड़ा  खेत  के  छूटे  रहट  वहीं
दड़बों से आगे कुछ नहीं जितने भी घर दिये।३।
**
वो भी धरौंदे तोड़  के  हम  से ही  थे गहे
कहकर सहारा आप ने तिनके अगर दिये।४।
**
कोई चमन  के  फूल  को  पत्थर बना रहा
कोई था जिसने शूल भी फूलों से कर दिये।५।
**
वो भी किये हैं जाग के सबने यहाँ खराब
अच्छी सी नींद के लिए जितने पहर दिये।६।
*
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Views: 496

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Comment by आशीष यादव on August 26, 2020 at 1:42am

अच्छी गजल हुई है। बधाई स्वीकार करें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 18, 2020 at 8:20am

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on August 17, 2020 at 4:17pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छस है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 15, 2020 at 5:13am

आ. भाई ब्रजेश जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 14, 2020 at 10:09pm

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय

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