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बचपने की उम्र है

खेल लेने दो इन्हे यह बचपने की उम्र है

गेंद लेकर हाथ में जा दृष्टि गोटी पर टिकी

लक्ष्य का संधान कर ,  एकाग्रता की उम्र है

खेल.....

गोल घेरे को बना हैं धरा पर बैठे हुए

हाथ में कोड़ा लिए इक,सधे पग धरते हुए

इन्द्रियाँ मन में समाहित, साधना की उम्र है

खेल.....

टोलियों में जो परस्पर आमने और सामने

ज्यों लगे सीमा के रक्षक शस्त्र को हैं तानने

व्यूह रचना कर समर को जीतने की उम्र है

खेल.....

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Usha Awasthi on May 29, 2020 at 3:55pm

सादर प्रणाम , रचना पसंद आई , जान कर खुशी हुई ।

बहुत धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 29, 2020 at 1:28pm

आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Usha Awasthi on May 28, 2020 at 3:24pm

आदाब,  समर कबीर जी , हार्दिक धन्यवाद आपका

Comment by Usha Awasthi on May 28, 2020 at 3:21pm

आदाब,अमीरुद्दीन खान साहेब ,मैं स्वयं विधा की जानकार नहीं हूँ।मैं तो केवल अपने भावों को शब्दों में  पिरो देती हूँ।हार्दिक आभार आपका।

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 2:22pm

मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 28, 2020 at 9:55am

आदरणीय ऊषा अवस्थी जी, आदाब। हालांकि मुझे हिन्दी पद्य विधा के विषय में अधिक ज्ञान नहीं है, फिर भी आपकी ये रचना मुझे बहुत अच्छी लगी। बधाई स्वीकार करें। सादर। 

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