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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – August 2021 Archive (6)

जन्माष्टमी के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

वाणी ने आकाश से, किया यही उद् घोष

सँभलो पापी कंस अब,घट से बाहर दोष।१।

*

मथुरा में  पर  कंस  का, घटा न अत्याचार

विवश हुए अवतार को, जग के पालनहार।२।

*

बहन देवकी, तात को, मिला कंस से कष्ट

हरे सकल दुख ईश  ने, बन कर पुत्र अष्ट।३।

*

लीला अंशों की तजी, लिया पूर्ण अवतार

स्वयं खुल गये  तेज  से, कारागृह के द्वार।४।

*

हुई विवश माँ देवकी, तज ने को मजबूर

छोड़ यशोदा  गेह  में, किया  कंस से दूर।५।

*

गोकुल आकर कृष्ण ने, दिया सभी को…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 26, 2021 at 12:43pm — 6 Comments

अपनी जिन्दगी - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"(गजल)

२१२२/२१२२/२१२



झेलती  मझधार  अपनी  जिन्दगी

कब  लगेगी  पार  अपनी जिन्दगी ।१।

*

आटा-चावल शाक-सब्जी के लिए

खप गयी बस यार अपनी जिन्दगी ।२।

*

शब्द  इस  में  है  न  कोई  हर्ष का

बस दुखों का सार अपनी जिन्दगी।३।

*

यूँ कमी उल्लास की होती न फिर

होती गर  त्यौहार  अपनी जिन्दगी।४।

*

हम ने ही  जन्जीर  बाँधी  पाँव को

कैसे  ले  रफ्तार  अपनी  जिन्दगी ।५।

*

सोच मत आकर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 24, 2021 at 7:26am — 4 Comments

सहज त्योहार है राखी -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



सनातन धर्म का गौरव सहज त्योहार है राखी

समेटे प्यार का खुद में अजब संसार है राखी।१।

*

हैं केवल रेशमी धागे  न  भूले से भी कह देना

लिए भाई बहन के हित स्वयं में प्यार है राखी।२।

*

पुरोहित देवता भगवन सभी इस को मनाते हैं

पुरातन सभ्यता की इक मुखर उद्गार है राखी।३।

*

बुआ चाची ननद भाभी सखी मामी बहू बेटी

सभी मजबूत रिश्तों का गहन आधार है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2021 at 12:00am — 21 Comments

देश जयचंदों की क्या जागीर है- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२



होंठ हँसते हैं  तो  मन में पीर है

जिन्दगी की अब यही तस्वीर है।२।

*

जो सिखाता था कलम ही थामना

वो भी  हाथों  में  लिए  शमशीर है।२।

*

झूठ को आजाद रक्खा नित गया

सच के  पाँवों  में  पड़ी  जंजीर है।३।

*

हाथ जन के वो न आयेगा कभी

उसका वादा सिर्फ उड़ता तीर है।४।

*

रास नेताओं  से  करती है बहुत

रूठी जनता की सदा तक़दीर है।५।

*

इक दफ़अ बोला तो फिर छूटा नहीं

झूठ की  भी  क्या  गजब तासीर है।६।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 17, 2021 at 6:30am — 10 Comments

सावन गुजर गया

२२१/२१२१/१२२१/२१२



तकरार करते करते ही सावन गुजर गया

मनुहार करते करते ही सावन गुजर गया।१।

*

बाधा मिलन में उनसे जो हालात थे उलट

अनुसार करते करते ही सावन गुजर गया।२।

*

हम खुद में व्यस्त  और  वो औरों में व्यस्त थे

व्यवहार करते  करते  ही  सावन  गुजर गया।३।

*

इस पार हम थे बैठे तो उस पार थे सजन

नद पार करते करते ही सावन गुजर गया।४।

*

उनसे मिलन की बात थी लेकिन हमें ये मन

तैय्यार करते …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 8, 2021 at 10:00pm — 13 Comments

नहीं कर कुन्द पाओगे कलम की धार नेता जी

१२२२/१२२२/१२२२/१२२



तुम्हारी कुर्सी का  जब  है  यही  आधार नेता जी

कहो फिर देश की जनता लगे क्यों भार नेता जी।१।

*

सिकुड़ती देश की सीमा तुम्हें दिखती नहीं है पर

लगे करने में कुनबे  का  सदा अभिसार नेता जी।२।

*

जिताकर वोट से जनता बनाती दास से मालिक

जताते क्यों नहीं उस का  कभी आभार नेता जी।३।

*

बने केवल धनी का ही सहारा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 7, 2021 at 5:30am — 14 Comments

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"आदरणीय आदरणीय चेतन प्रकाशजी मेरे प्रयास को मान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। हार्दिक आभार। सादर।"
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"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, प्रदत्त चित्र पर बढ़िया प्रस्तुति। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई। सादर।"
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