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Vijay nikore's Blog (212)

विकल विदा के क्षण

विकल विदा के क्षण

सिहरता सूनापन

संग्रहीत हैं अनायास उमड़ते  अनुभव

पता नहीं अब जीवन के इस छोर पर

प्रलय-पवाह  जो  भीतर  में  है

वह  बाहर  व्याप्त  हो  रहा  है,  या

स्तब्धता जो बाहर है, घुटती-बढ़ती

आकर समा गई है  हृदय  में  आज

मेरी कमज़ोरियों का रूपांकन करती

शोचनीय स्थिति मेंं मूलभूत समस्याएँ

अवसर-अनवसर झुठलाती हैं मुझको

उभरते हैं पुराने जमे दुखों के बुलबुले

दुख  में  छटपटाती  सलवटों …

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Added by vijay nikore on December 17, 2017 at 7:21am — 21 Comments

पलकों में प्यार

समय की कोई अनदेखी गुमनाम कढ़ी

संभावनाओं की  रूपक  रश्मि से  भरी

प्राण-श्वास को पूर्ण व पुलकित करती

पेड़ों की छायाएँ घटती मिटती बढ़ती-सी

धरती के गालों पर छायाएँ बेचैन नहीं थीं

किसी मीठे समीर की मीठी कोमल झकोर

हँसा कर फूलों को करती थी आत्म-विभोर

प्रात की नई उमंगों में भू को नभ से जोड़ते

जिज्ञासा की उजली चादर के फैलाव में हम

कोरे बचपन में एक ही पथ पर थे साथ चले

आयु की मामूली सच्चाईओं से घिरे हम…

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Added by vijay nikore on December 3, 2017 at 12:36am — 10 Comments

आत्म-संवाद

समय के साँचे में कुछ भभका सहसा

गुन्थन-उलझाव व भार वह भीतर का

चिन्ताग्रस्त, तुमने जो किया सो किया

वह प्रासंगिक कदाचित नहीं था

न था वह स्वार्थ न अह्म से उपजा

किसी नए रिश्ते की मोह-निद्रा से प्रसूत

ज़रूर वह तुम्हारी मजबूरी ही होगी

वरना कैसे सह सकती हो तुम

मेरी अकुलाती फैलती पीड़ा का अनुताप

तुम जो मेरे कँधे पर सिर टिकाए

आँखें बन्द, क्षण भर को भी

मेरा उच्छवास तक न सह सकती थी

और अब…

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Added by vijay nikore on November 29, 2017 at 7:51am — 15 Comments

बिखराव

हुआ होगा कुछ आज ही के दिन

भयानक सनसनी अभी अचानक

थम गई

हवा आदतन अंधेरे आसमान में

कहाँ से कहाँ का लम्बा सफ़र तय कर

थक गई

पत्तों की पत्तों पर थपथपी

अब नहीं

रुकी हुई है पत्तों पर कोई अचेत अवस्था

या, असन्तुलनात्मक ख़ामोशी से उपजी

है आज भीतर अनायास उदास अनवस्था

बातों बातों में हम भी

तो रूठ जाते थे कभी

फिर भी हृदय सुनते थे स्वर

कुछ ही पल, आँखों से आँखों में देख

दुलारते

हँस…

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Added by vijay nikore on November 23, 2017 at 6:31pm — 11 Comments

पगलाया विश्वास

आँसुओं-सिंची आस्था

हर धूल भरी पगडण्डी पर अब मानो

फैले हैं पूर्तिहीन स्वप्नों के श्मशान

अकुलाते अनुभवों के कांटेदार गहन सत्य

तकलीफ़ भरे गड्ढों में चिन्ता की छायाएँ

रहस्यात्मक अहातों के उस पार

अन्धकार-विवरों में होगी यकीनन

अनबूझे सपनों की अनबूझी बेचैनी

लौट आएँगी अनायास असंतोष भरी

स्वाभाविक  हमारी  पुरानी  वेदनाएँ

इस पर भी अनजाने-अनपहचाने, प्रिय

न जाने किस-किस आकाशीय मार्ग से

चली आती हैं…

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Added by vijay nikore on November 6, 2017 at 1:43pm — 21 Comments

प्राण-स्वप्न

ख़्यालों में गिरफ़्तार

गम्भीर   उदास

अपना सिर टेक कर

इ-त-नी पास

तुम इतनी पास

तो कभी नहीं बैठती थी

फिर आज...?

मिलने पर 

न स्वागत

न शिकायत

न कोई बात

अपने में ही सोचती-सी ठहरी

धड़कन की खलबली में भी

तुम इतनी आत्मीय ...

मेरे बालों की अव्यवस्था को ठेलती

कभी शाम के मौन में  शाम की

निस्तब्धता को पढ़ती

शांत पलकें, अब अलंकार-सी

जागती-सी सोचती, कुछ…

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Added by vijay nikore on September 26, 2017 at 12:24pm — 12 Comments

एक दुखता फोड़ा ---- अमृता प्रीतम जी संस्मरण

३१ अगस्त... प्रिय अमृता प्रीतम जी का पावन जन्म-दिवस। बहुत ही याद आई, मेरे खयालों में तैरती बीते सालों की हवा लौट आई।

सन १९६४ ... अमृता प्रीतम जी और मैं अभी कुछ ही दिन पहले मिले थे। तत्पश्चात टेलिफ़ोन पर उनसे बात हुई तो कुछ दार्श्निक सोच में थीं। बात बदलते हुए मौसम से ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव पर, और फिर झरने पर... जहाँ पानी नीचे गिरता है, गिर कर ऊपर नहीं उठता।  जानते हुए कि वह उस दिन तमस-भाव में थीं, मैं उनकी…

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Added by vijay nikore on September 1, 2017 at 5:52am — 14 Comments

दरगाह

प्रकाश को काटते नभोचुम्बी पहाड़

अब हुआ अब हुआ अँधेरा-आसमान ...

अनउगा दिन हो यहाँ, या हो अनहुई रात

किसी भी समय स्नेह की आत्मा की दरगाह

दीवारों के सुराख़ों में से बुलाती है मुझको

और मैं आदतन चला आता हूँ तत्पर यहाँ

पर आते ही आमने-सामने सुनता हूँ आवाज़ें

इस नए निज-सर्जित अकल्पनीय एकान्त में

अनबूझी नई वास्तविकताओं के फ़लसफ़ों में

और ऐसे में अपना ही सामना नहीं कर पाता

झट किसी दु:स्वप्न से जागी, भागती,…

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Added by vijay nikore on August 25, 2017 at 6:49am — 23 Comments

आलोक-मंजुषा ... (संस्मरण -- डा० रामदरश मिश्र जी)

यह संस्मरण लेखक, कवि, उपन्यासकार डा० रामदरश मिश्र जी के संग बिताय हुए सुखद पलों का है।

सपने प्राय: अप्रासंगिक और असम्बद्ध नहीं होते। कुछ दिन पहले सोने से पूर्व मित्र-भाई रामदरश मिश्र जी से बात हुई तो संयोगवश उनका ही मनोरंजक सपना आया ... सपने में बचपन के किसी गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू, कुनकुनी धूप, और बारिश एक संग, ... और उस बारिश में बच्चों-से भागते-दोड़ते रामदरश जी और मैं ... कुछ वैसे ही जैसे उनकी सुन्दर कविता “बारिश में भीगते बच्चे” मेरे सपने में जीवंत हो गई…

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Added by vijay nikore on August 15, 2017 at 4:00pm — 8 Comments

अधजले ठूँठ

प्रतीक्षातुर पलों में, नींदों में

आर-पार जाती पारदर्शी सोच में

परस्पर आत्मीय पहचान 

हम दोनों के ओंठ मुस्करा देते

हवा में आगामी प्रातों की ओस-सुगन्ध

हमारी बातों में कहीं  "न"  नहीं  थी

कभी कोई इनकार नहीं था, पुकार थी बस

धधकते हुए सूरज में प्रखर तेज था तब

उस प्रदीप्त धूप की छाती में

कुछ भसम करने की चाह नहीं थी

मैदानों को चीरती हवाओं में

थी रोम-रोम में उमंग 

सूरज की उजाड़ किरणों में अब

अपने…

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Added by vijay nikore on August 7, 2017 at 4:31pm — 4 Comments

स्नेहसिक्त भाव

तुमसे मिलने की उदात्त प्रत्याशा ...

प्रेरणा के प्रहर थे 

स्वत: मुस्कराने लगे

तुम्हारे आने का मौसम ही होगा

वरना वीरान हवाओं में

ध्वनित-प्रतिध्वनित न होते 

यूँ वह गीत-आलाप सुरीले पुराने 

उस अमुक अरुणोदय से पहले ही एक संग

हर फूल, कली, हर पत्ते का झूम-झूम गाना

हाथ-में-हाथ पकड़ खेलना, तुम्हें गुनगुनाना

और नवजात-सी उत्सुक पक्षिणियों का 

सांवले पंख फैला

चोंच-मार खेलना, चहचहाना…

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Added by vijay nikore on August 6, 2017 at 7:57pm — 9 Comments

गहरी पहचान

(इस वर्ष आ रही ४५ वीं वर्षगाँठ के लिए

जीवन-संगिनी प्रिय नीरा जी को सप्रेम समर्पित)

                      ------

हो विश्वव्यापी सूर्य

या हों व्योम की तारिकाएँ

गहन आत्मीयता की उष्मा प्रज्ज्वलित

तुम्हारा स्वर्णिम सुगंधित साथ

काल्पनिक शून्य में भी हो मानो

तुम यहीं-कहीं आस-पास ...

सम्मोहित

शनै:-शनै: सहला देती हूँ तुम्हारा हाथ

संकुलित कटे-छंटे शब्द हमारे

मन्द्र मौन में रीत जाते

और कुछ और…

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Added by vijay nikore on August 5, 2017 at 4:00pm — 14 Comments

झंझावात

धूप की तिरछी किरणें

बारिश की बूँदें

रंभाती हवाएँ

सभी एक संग ...

धूल के कण

मानो उड़ रहे हैं सपने

विचित्र रूप ओढ़े है धरती

सारा कमरा

चौकन्ना हो गया है

असंतोष मुझको है गहरा

लौट-लौट आ रहे हैं

दर्दीले दृश्य दूरस्थ हुई दिशाओं से

भूली भीषण अधूरी कहानी-से

उलझे ख़याल ... 

तुम्हारे, मेरे

मकड़ी के जाल में अटके जैसे

हमारे सारे प्रसंग

जिनका आघात

हम दोनों को…

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Added by vijay nikore on July 23, 2017 at 3:00pm — 29 Comments

हृदय-सम्बन्ध .... क्षणिकाएँ

१.

अर्थहीन प्रश्नों के

चकरदार अर्थ

अर्थहीन न तो क्या होंगे

घेर लेते हैं मुझको

छेड़ी हुई मधुमक्खियों की तरह

अब मुंद जाने दो आँखें

बन्द कर दो किवाड़

             -----

२.

कोमल पत्तों पर अटकी

प्रांजल बूँदें ...

अपनी ही गढ़ी हुई 

वेदना का विस्तार

शायद ... तुम ...

मन के गहरे में कुछ

पल्लवित होना चाहता है

            -----

३.

कभी ऐसा भी तो होता…

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Added by vijay nikore on July 3, 2017 at 8:29am — 14 Comments

अनुभव-धारा

सांसारिक स्वार्थग्रस्त प्रक्रियाओं से घबराकर

मुझसे ही कतराकर

चल बसी थी अकुलाती मेरी आस्था

उसके अंतिम संस्कार से पहले

टूटे विश्वास से फूटी तो थी रक्तधार

पर यह तो सदियों पुरानी बात है

समझ में न आए

कुलाँचते ख्यालों की अदृश्य रगों में

आज इतनी तपिश क्यूँ है

यादों के घावों को चोंच मार

छील गया कोई कैसे

कब से यहाँ जब कोई पास नहीं है

मेरी ही आन्तरिक कमज़ोरी को जानकर

तकलीफ़ भरे धूल…

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Added by vijay nikore on June 24, 2017 at 7:30am — 19 Comments

क्षणिकाएँ

१. 

निद्राधीन निस्तब्धता

कुलबुलाता शून्य

सनसनाता पवन

डरता है मन

अर्धरात्रि में क्यूँ

कोई खटखटाता है द्वार

प्रलय, सोने दो आज

        ------

२.

मेरी ही गढ़ी तुम्हारी आकृति

बारिश की बूँदें

तुम्हारे आँसू

तुम्हारी खिलखिलाती हँसी

कल्पना ही तो हैं सब

वरना 

मुद्दतें हो गई हैं तुमसे मिले

          -----

३.

कभी अपना, कभी

अपनी छाया का…

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Added by vijay nikore on May 6, 2017 at 10:24am — 24 Comments

ठहराव ..?

आदतन हर रोज़ सवेरे-सवेरे

बुझते विश्वास की गहरी पीर

मौन विवशता के आवेशों में

बहता मन में निर्झर अधीर

आस-पास लौट आता है उदास

अकस्मात अनजाने तीखा गहरा

गहरे विक्षोभों का सांवला

देहहीन दर्दीला उभार

ज़िन्दगी के अब ढहे हुए बुर्जों में

विद्रोही भावों के अवशेष धुओं में

है फिर वही, फिर वही असहनीय

अजीब बदनसीब अनथक तलाश

नियति के नियामक चक्रव्यूहों में

पुरानी पड़ गई बिखरती लकीरों…

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Added by vijay nikore on April 16, 2017 at 5:28pm — 9 Comments

गुँथन-उलझन

शंका और विश्वास के दोराहे पर 

मन में पीली धुंधली उदास गहरी

बेमाप वेदना यथार्थों की लिए

स्वीकार कर लेता हूँ सभी झूठ 

कि जाने कब कहाँ किस झूठ में भी

किसी की विवशता दिख जाए, या

मिल जाए उसकी सच्चाई का संकेत

कि जानता हूँ मैं, यह ठंडी पुरवाई

यह फैली हुई धूप नदी-झील-तालाब

सब कहते हैं  ...

वह कभी झूठी नहीं थी

ऊँची उठती है कोई उभरती कराह

स्वपनों के अनदेखे विस्तार में

विद्रोह करते हैं मेरे…

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Added by vijay nikore on March 15, 2017 at 7:32pm — 12 Comments

विवश वेदना

बियाबान-सी रात, मद्धम है चाँदनी

एक अधूरे रिश्ते के आकुलित अनुभव

बिखरे-बिखरे-से... कोने-कोने में

बेचैन इस दर्द भरे अन्धेरे में

चेहरे पर भय की रेखाएँ



माना कि बीच हमारे अब कोई दीवार

बहुत ऊँची बहुत ऊँची

ढरते-भुरते विश्वास के आईने पर

घावों की छायाओं के धब्बेे

भी गहरे अब बहुत गहरे



फिर भी कुछ जीवित है



समय की टूटी सीढ़ी चढते

क्षण-भर को भी भाव-विभोर हो

आ सको तो आओ

पाओ मुझमें…

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Added by vijay nikore on February 5, 2017 at 5:07pm — 15 Comments

स्नेह-लहरी

हर पर्व से पहले आते थे तुम

हँसती-हँसती, मैं रंगोली सजा देती ...

नाउमीदी में भी कोई उमीद हो मानो

मेरी अकुलाती इच्छाएँ तुम्हारी राह तकती थीं

श्रद्धा के द्वार पर अभी भी मेरे प्रिय परिजन

सूर्य की किरणें ठहर जाती हैं

चाँद जहाँ भी हो, पर्व की रातों कोई आस लिए

आकर छत पर रुक जाता है

तन्हा मैं, सोच-सोच में

ढूँढती हूँ बाँह-हाथ तुम्हारे

स्पर्श से पूर्व विलीन हो जाते हैं स्पर्श

उदास साँवले दिन की…

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Added by vijay nikore on February 3, 2017 at 11:50am — 15 Comments

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