For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog (511)

पहलगाम ही क्यों कहें - दोहे

रक्त रहे जो नित बहा, मजहब-मजहब खेल।

उनका बस उद्देश्य यह, टूटे सबका मेल।।

*

जीवन देना कर सके, नहीं जगत में कर्म।

रक्त पिपाशू लोग जो, समझेंगे क्या धर्म।।

*

छीन किसी के लाल को, जो सौंपे नित पीर।

कहाँ धर्म के मर्म को, जग में हुआ अधीर।।

*

बनकर बस हैवान जो, मिटा रहे सिन्दूर।

वही नीच पर चाहते, जन्नत में सौ हूर।।

*

मंसूबे उनके जगत, अगर गया है ताड़।

देते है फिर क्यों उन्हें, कहो धर्म की आड़।।

*

पहलगाम ही क्यों कहें, पग-पग मचा…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 30, 2025 at 11:26am — 3 Comments

दोहे -रिश्ता

सब को लगता व्यर्थ है, अर्थ बिना संसार।

रिश्तों तक को बेचता, इस कारण बाजार।।

*

वह रिश्ते ही सच  कहूँ, पाते  लम्बी आयु

जहाँ परखते हैं नहीं, दीपक को बन वायु।।

*

तोड़ो मत विश्वास की, कभी भूल से डोर

यह टूटा तो हो  गया, हर रिश्ता कमजोर।।

*

करे दम्भ लंकेश सा, कुल का पूर्ण विनाश।

ढके दम्भ की धूल ही, रिश्तों का आकाश।।

*

रिश्तों में  सब  ढूँढते, केवल स्वार्थ जुगाड़।

शेष बची है अब कहाँ, अपनेपन की आड़।।

*

सुख में सब वाचाल हैं, दुख में बेढब…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2025 at 8:50pm — 4 Comments

दोहा दसक- गाँठ





ढीली मन की गाँठ को, कुछ तो रखना सीख।

जब  चाहो  तब  प्यार से, खोल सके तारीख।१।

*

मन की गाँठे मत कसो, देकर बेढब जोर

इससे  केवल  टूटती, अपनेपन  की डोर।२।

*

दुर्जन केवल बाँधते, लिखके सबका नाम

लेकिन गाँठें खोलना, रहा संत का काम।३।

*

छोटी-छोटी बात जब, बनकर उभरे गाँठ

सज्जन को वह पीर दे, दुर्जन को दे ठाँठ।४।

*

रिश्तो को कुछ धूप दो, मन की गाँठे खोल

उनको मत मजबूत कर, कड़वी बातें बोल।५।

*

बातें कहकर खोल दे, बाँध न रहकर मौन

मन की…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2025 at 11:31pm — 4 Comments

दोहा दसक- झूठ



अगर झूठ को बोलिए, ठोक पीट सौ बार

सच से बढ़कर मानता, उसको भी संसार।१।

*

रहा झूठ से  कौन  है, वंचित कहो अबोध

भले न बोला हो गया, होकर कभी सबोध।२।

*

होता मुख पर झूठ के, नहीं तनिक भी नूर

जीवन पाता  अल्प  ही, पर  जीता भरपूर।३।

*

जीवन में बोला नहीं, कभी एक भी झूठ

हरा पेड़ तो  छोड़िए, मिला न कोई ठूँठ।४।

*

होता सच में जो नहीं, वही झूठ का काम

भले न बोला पर लिखा, धर्मराज के नाम।५।

*

भोला  देता  ताव  है,  करके  ऊँची  मूँछ

धूर्त…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2025 at 7:45am — 4 Comments

दोहा दसक -वाणी

दोहा दसक -वाणी

**************

वाणी का विष लोक में, करे बहुत उत्पात

वाणी पर संयम रखो, सच कहते थे तात।१।

*

वाणी  में  संयम  नहीं, अब  तो संत कुसंत

जग में कैसे हो भला, फिर विवाद का अंत।२।

*

वाणी का रहता हरा, भरता तन का घाव

वाणी ही पुल मेल का, वाणी नदी दुराव।३।

*

वाणी जो कटुता भरी, विष के तीर समान

वो तो करती नित्य  ही, रिश्तों पर संधान।४।

*

सुन्दर वाणी रख सदा, भले न सुन्दर देह

देह न मन में नित बसे, वाणी करती…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2025 at 10:25pm — 2 Comments

दोहा दसक - सपने

यूँ तो जीवन हर समय, मृगतृष्णा के पास

सच हो जाते स्वप्न पर, करके सत्य प्रयास।१।

*

देख दिवस में सप्न जो, करता खूब प्रयत्न

वह उनको  साकार  कर, पा  लेता है रत्न।२।

*

जिसने जीवन में किया, सपने को कर्तव्य

टूटा करता  वह  नहीं, बन  जाता है भव्य।३।

*

स्वप्न बने उद्देश्य  जब, करना  पड़ता कर्म

जीवन में सबसे प्रथम, समझ इसे ही धर्म।४।

*

निज जीवन के स्वप्न जो, पर हित में दे त्याग

मान उसे  सबसे  अधिक, सपनों से अनुराग।५।

*

सपने …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2025 at 8:35am — 2 Comments

कहीं खो गयी है उड़ानों की जिद में-गजल

१२२/१२२/१२२/१२२

****

कभी तो स्वयं में उतर ढूँढ लेना

जहाँ ईश रहते वो घर ढूँढ लेना।१।

*

हमेशा दवा ही नहीं काम आती

कहीं तो दुआ का असर ढूँढ लेना।२।

*

कहीं खो गयी है उड़ानों की जिद में

कि बच्चो बड़ों की उमर ढूँढ लेना।३।

*

तलाशे बहुत वट सदा काटने को

कभी छाँव को भी शज़र ढूँढ लेना।४।

*

हमेशा लड़ा ले सिकंदर की चाहत

कभी बनके पोरस समर ढूँढ लेना।५।

*

मिलेगा नहीं कुछ ये नीदें चुराकर

हमें फर्क किससे क़सर…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2025 at 12:02pm — 4 Comments

शंका-दोहा अष्टक-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

शंका-दोहा अष्टक

***

शंका दुख को जन्म दे, शंका मतकर व्यर्थ।

घर-बाहर इससे सदा, होता सकल अनर्थ।१।

*

आसपास जब-जब बढ़े, शंकाओं के शूल।

असमय जाते सूख तब, सुख के सारे फूल।२।

*

शंका नामक रोग  से, तन-मन जल भंगार।

औषध पाया खोज कब, इस का ये संसार।३।

*

लघुतम रहे विवाद को, शंका नित दे तूल।

संतों को असहज रहे, दुर्जन को अनुकूल।४।

*

शंका उस मन जन्म ले, जिसमें रहता खोट।

सदा  रक्तरंजित   रहे,  इससे  पाकर  चोट।५।

*

शंका बैरी चैन…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 25, 2025 at 7:40am — No Comments

गणतंत्र ( दोहा सप्तक ) -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'



जन्म दिवस गणतंत्र का, मना रहे हम आज

रखने  को  सौगंध  खा, संविधान  की लाज।।

*

नाम रखा गणतंत्र गह, राजतंत्र की रीत

कैसे हो गण का भला, ऐसे में कह मीत।।

*

संविधान  की  पीठ  ने, रचे  बहुत  से स्वप्न

गण तक पहुँचे वो नहीं, तंत्र कर गया दफ्न।।

*

पथ में बिखरे शूल सब, यदि ले तंत्र समेट

जनसेवक से हो  नहीं, जनता का आखेट।

*

आठ दशक से जप रहे, गण हैं जिसका मंत्र

देता रोक  स्वराज  वह, क्यों पगपग पर तंत्र।।

*

गण की गण…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 25, 2025 at 7:30am — No Comments

नए साल में - गजल -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

पूछ सुख का पता फिर नए साल में

एक निर्धन  चला  फिर नए साल में।१।

*

फिर वही रोग  संकट  वही दुश्मनी

क्या हुआ है नया फिर नए साल में।२।

*

बात यूँ तो  विगत भी रही अनसुनी

किसने माना कहा फिर नए साल में।३।

*

लोग नफरत  पहन  दौड़ते जा रहे

जब वही है हवा फिर नए साल में।४।

*

मैं न स्वागत  न  तू दोस्ती कर रहा

कौन सीखा बता फिर नए साल में।५।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 12, 2025 at 7:45am — No Comments

भाग्य और गर्भ काल ( दोहा दसक)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

चाहे करता  भाग्य  ही, जीवन भर संयोग

उच्च कर्म से भाग्य भी, बदला करते लोग।१।

*

सद्कर्मों की  चाल  से, माता देकर त्राण

गर्भकाल में जीव का, करे भाग्य निर्माण।२।

*

कर्म भाग्य  दोनों  रहें, जब  बन पूरक रोज

पाते दुख के गाँव में, मानव तब सुख खोज।३।

*

सदा कर्म ही जीव का, देता है फल जान

उद्यत लेकिन कर्म को, भाग्य करे नादान।४।

*

गर्भकाल है स्वर्ग या, जीवन से बढ़ नर्क

या लेखा है भाग्य का, अपने अपने तर्क।५।

*

गर्भ काल सब…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2025 at 1:30pm — No Comments

दोहा दसक- बेटी -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

बेटी  को  बेटी  रखो, करके  इतना पुष्ट

भीतर पौरुष देखकर, डर जाये हर दुष्ट।१।

*

बेटा बेटा  कह  नहीं, बेटी  ही  नित बोल

बेटा कहके कर नहीं, कम बेटी का मोल।२।

*

करती दो घर  एक  है, बेटी पीहर छोड़

कहे पराई पर उसे, जग की रीत निगोड़।३।

*

कर मत कच्ची नींव पर, बेटी का निर्माण

होता नहीं  समाज  का, ऐसे जग में त्राण।४।

*

बेटी को मत दीजिए, अबला है की सीख

कर्म उसी के गेह  से, रहे चाँद तक चीख।५।

*

बेटों को भी दीजिए, कुछ ऐसे सँस्कार

बेटी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 7, 2025 at 1:27pm — No Comments

दोहा सप्तक - नाम और काम- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

नाम भले पहचान  है, किन्तु बड़ा है कर्म

है जीवन में वो सफल, जो समझा ये मर्म।१।

*

महिमा कहते कर्म की, जग में संत कबीर

नाम-नाम ही जो रटे, समझो सिर्फ फकीर।२।

*

नामीं द्विज भी रह गये, कर्म फला रैदास

पुण्य कर्म  आशीष  को, गंगा  माई पास।३।

*

केवल कर्म बखानता, जग में है इतिहास

सूरज  जैसा  कर्म  ही, देता  नाम उजास।४।

*

दबे कोख इतिहास की, कर्महीन जो गाँव

किन्तु उजागर हो गये, सदा कर्म के पाँव।५।

*

लिखे कर्म की लेखनी, चमक चाँदनी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 6, 2025 at 5:40pm — No Comments

शीत- दोहा दसक-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

शीत लहर की चोट से, जीवन है हलकान

आँगन जले अलाव तो, पड़े जान में जान।१।

*

मौसम का क्या  हाल  है, पर्वत  पूछे नित्य

ठिठुर चाँद सा हो गया, क्या बोले आदित्य।२।

*

धुन्ध फैलती जा रही, ठिठुरन  है चहुँ ओर

गर्म लहू का देह में, शिथिल पड़ गया जोर।३।

*

चला न पलभर सिर्फ रख, एसी-कूलर बंद

तन कहता है खूब ले, कम्बल का आनन्द।४।

*

फैला चादर  धुन्ध  की, हो मौसम गम्भीर

कहे सुखाओ रे! इसे, मिलकर सूर्य समीर।५।

*

पीते गटगट  चाय  सब, पहने  मोजे…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 4, 2025 at 2:23pm — No Comments

नये साल में-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

212 /212/ 212 /212 

*

बच पवन  से  सँभलना  नये  साल में

हमको दीपक सा जलना नये साल में।१।

*

मेट  अन्याय  और  कालिमा  चाहिए

न्याय  विश्वास  फलना  नये  साल में।२।

*

छोड़ना  है  हमें  देश  हित में सहज

नफरतों  से   उबलना  नये  साल में।३।

*

सिर्फ रिश्तों की खातिर भुला द्वेष को

मन से मन तक टहलना नये साल में।४।

*

होगा उन्नत बहुत देश अपना तभी

सब जिएँ छोड़ छलना नये साल में।५।

*

कर रहा…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 31, 2024 at 8:56am — No Comments

राम पाना कठिन शेष जीवन में पर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२

*

जो चले कर्म में सिलसिला राम का

लौट आये सनम काफ़िला राम का।१।

*

एक विनती  करें भोले  शंकर से हम

देश ही क्या जगत हो जिला राम का।२।

*

धन्य जीवन  हमारा  भी होता बहुत

देख लेते अगर मुख खिला राम का।३।

*

जो भी वंचित  सदा  दुख  रहे भोगते

हैं सुखी साथ जिनको मिला राम का।४।

*

दोष मढ़ते  बहुत  वो  अधम राम पर

भेद पाये  नहीं  जो  किला  राम का।५।

*

राम पाना कठिन शेष जीवन में पर…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 29, 2024 at 2:00pm — No Comments

जिन्दगी भर बे-पता रहना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२

*

जिन्दगी  भर  बे-पता  रहना

हर जुबा पर हाँ लिखा रहना।१।

*

हर तरफ मौसम विषम होंगे

बस कुटज सा तू जगा रहना।२।

*

सन्त बिच्छू की कथा कहती

जात  में  अपनी  बना रहना।३।

*

झूठ चाहे चल रहा जग भर

सत्य मन  तू  बोलता रहना।४।

*

माँ पिता के छिन गये साये

सीख उससे बे-ख़ुदा रहना।५।

*

धीरता  कुछ   सीख  धरती से

हर समय क्या जलजला रहना।६।

*

क्या है करना  बेबफा जग…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 28, 2024 at 2:00pm — No Comments

दोहा पंचक - राम नाम

तनमन कुन्दन कर रही, राम नाम की आँच।

बिना राम  के  नाम  के,  कुन्दन-हीरा  काँच।१।

*

तपते दुख की  धूप  में, जब जीवन के पाँव।

तन-मन तब शीतल करे, राम नाम की छाँव।२।

*

राम नाम की नित सुधा, पीते हैं जो लोग।

सन्तापित  होते  नहीं, चाहे दुख का योग।३।

*

चाहे दाता  राम  पर, मिलता  सब कर कर्म।

जो समझा इस बात को, करता नहीं अधर्म।४।

*

राम नाम का मर्म जो, समझ हुआ निष्काम।

उसको लगती भोर सी, ढलती जीवन शाम।५।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 15, 2024 at 10:57pm — 2 Comments

दोहे-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

क्षणभंगुर है आजकल, शीशे सा संकल्प।

राम सरीखा कौन अब, सारे मन के अल्प।।

*

जो आगन को लड़  रहे, भाई से हर शाम

कमतर देखो लग रहा, उन्हें राम का काम।।

*

सूपनखा की कट गयी, लछमन हाथों नाक

बनी रही फिर भी वही, तीन पात का ढाक।।

*

जनमर्यादा  को  करे, कौन  राम सा त्याग

ढूँढा करते किन्तु सब, राम काज में दाग।।

*

दण्ड लखन को मृत्यु का, सीता को वनवास

सहा न क्या-क्या राम…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 27, 2024 at 8:57am — No Comments

मन में केवल रामायण हो (,गीत)- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

कितना भी दुविधा का क्षण हो

मन   में   केवल   रामायण  हो।।

*

बनना जितना राम असम्भव

उससे बढ़कर भरत कठिन है।

जीवन  में  चहुँ   ओर  मंथरा

जब उकसाती हर पलछिन है।।



कलयुग के सिर दोष न मढ़ना

देख स्वयम् को निज दर्पण हो।।

*

इच्छाओं     के     कुरुक्षेत्र में

भीष्म सरीखा जब हो घायल।

और ज्ञान के नभ मण्डल में

शंकाओं   के   छायें  बादल।।



पर तुम विचलित कभी न होना

आस-पास  कितना  भी रण हो।।

*

गोवर्धन  नित  पड़े …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 26, 2024 at 12:21pm — 4 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं
"आदरणीय Jaihind Raipuri साहिब, नमस्कार। बढ़िया ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। /ये मेरा…"
Friday
आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
Friday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service