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अभियंता दिवस पर मुक्तिका: हम अभियंता --अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'

अभियंता दिवस पर मुक्तिका:



हम अभियंता



अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'

*

कंकर को शंकर करते हैं हम अभियंता.

पग-पग चल मंजिल वरते हैं हम अभियंता..



पग तल रौंदे जाते हैं जो माटी-पत्थर.

उनसे ताजमहल गढ़ते हैं हम अभियंता..



मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, मठ, आश्रम तुम जाओ.

कार्यस्थल की पूजा करते हम अभियंता..



टन-टन घंटी बजा-बजा जग करे आरती.

श्रम का मन्त्र, न दूजा पढ़ते हम अभियंता..



भारत माँ को पूजें हम नव निर्माणों… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 16, 2010 at 10:17am — 5 Comments

तरही मुक्तिका:: कहीं निगाह... संजीव 'सलिल'

आत्मीय!

यह मुक्तिका १०.९.१० को भेजी थी. दी गयी पंक्ति न होने से सम्मिलित नहीं की गयी. संशोधन सहित पुनः प्रेषित.



तरही मुक्तिका::



कहीं निगाह...

संजीव 'सलिल'

*

कदम तले जिन्हें दिल रौंद मुस्कुराना है.

उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है



कहीं निगाह सनम और कहीं निशाना है.

हज़ार झूठ सही, प्यार का फसाना है..



न बाप-माँ की है चिंता, न भाइयों का डर.

करो सलाम ससुर को, वो मालखाना है..



पड़े जो काम तो तू बाप गधे को कह… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 16, 2010 at 9:19am — 10 Comments

पिछला सावन !

याद है मुझे !

पिछला सावन

जमकर बरसी थी

घटाएँ

मुस्कुरा उठी थी पूरी वादीयाँ

फूल, पत्तियां मानो

लौट आया हो यौवन



सब-कुछ हरा-भरा

भीगा-भीगा सा

ओस की बूँदें

हरी डूब से लिपट

मोतियों सी

बिछ गई थी

हरे-भरे बगीचे में

याद है मुझे !



गिर पडा था मैं

बहुत रोया

माँ ने लपक कर

समेट लिया था

उन मोतियों को

अपने आँचल में

मेरे छिले घुटने पे

लगाया था मरहम

पौंछ कर मेरे आँसू और

मुझे बगीचे…
Continue

Added by Narendra Vyas on September 15, 2010 at 10:16pm — 3 Comments

तोड़ना जीस्त का हासिल समझ लिया होगा

तोड़ना जीस्त का हासिल समझ लिया होगा

आइने को भी मेरा दिल समझ लिया होगा



जाने क्यूँ डूबने वाले की नज़र थी तुम पर

उसने शायद तुम्हे साहिल समझ लिया होगा



चीख उठे वो अँधेरे में होश खो बैठे

अपनी परछाई को कातिल समझ लिया होगा



यूँ भी देता है अजनबी को आसरा कोई

जान पहचान के काबिल समझ लिया होगा



हर ख़ुशी लौट गई आप की तरह दर से

दिल को उजड़ी हुई महफ़िल समझ लिया होगा



ऐ तपिश तेरी ग़ज़ल को वो ख़त समझते हैं

खुद को हर लफ्ज़ में शामिल समझ… Continue

Added by jagdishtapish on September 15, 2010 at 7:12pm — 6 Comments

कुछ न कुछ

कुछ न कुछ

मेरे शे-रों में कुछ न कुछ तो ज़रूर रहा होगा
वर्ना अश्क आपके,इस कदर न छलकते
अंधेरों में ही सही,चिराग जलाने चले आते हो
वर्ना मेरी मजार के आसपास,इस कदर बेबस न भटकते
मायूस होकर ना देखते,बंद फाइलों में तस्वीरें मेरी
मेरी यादों के लिए,इस कदर ना तरसते
यह तो 'दीपक कुल्लुवी' का वादा था याद रखेंगे
आप तो बेवफा थे,इस कदर बेवजह ना बदलते

दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'
०९१३६२११४८६
१५/०९/२०१०

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 15, 2010 at 11:16am — 3 Comments

नवगीत: अपना हर पल है हिन्दीमय... --संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत:

संजीव 'सलिल'

*

*

अपना हर पल

है हिन्दीमय

एक दिवस

क्या खाक मनाएँ?



बोलें-लिखें

नित्य अंग्रेजी

जो वे

एक दिवस जय गाएँ...



*



निज भाषा को

कहते पिछडी.

पर भाषा

उन्नत बतलाते.



घरवाली से

आँख फेरकर

देख पडोसन को

ललचाते.



ऐसों की

जमात में बोलो,

हम कैसे

शामिल हो जाएँ?...



हिंदी है

दासों की बोली,

अंग्रेजी शासक

की… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 15, 2010 at 7:54am — 3 Comments

हिन्दी दिवस

आज हिन्दी दिवस है . लेकिन क्या हम सही मायने में हिन्दी को वो सम्मान दे पा रहे है जो चाहिये, आज हिन्दी केवल कहने मात्र की राष्ट्र भाषा रह गई है | आज के युग में जहाँ हर तरफ पश्चिमी सभ्यता का चलन है इसलिये हमे हिन्दी का अस्तित्व बचाने के लिए बहुत प्रयास करना होगा तभी हिन्दी की गरिमा बच सकेगी और हिन्दी सही मायने में भारत की राष्ट्र भाषा बन सकेगी |
जय हिंद |

Added by Pooja Singh on September 14, 2010 at 5:30pm — 2 Comments

देश की खातिर जान देते हैं हम हिन्दुस्तानी ,

कल की बाते हुई पुरानी ये तो दुनिया मानी ,

देश की खातिर जान देते हैं हम हिन्दुस्तानी ,

आलग थलग हम बटे हुए थे छोटे छोटे राजो में ,

दम थी अपनी अपनी अलग अलग आवाजो में ,

मगर न थी एकता जो सब हमपे की मनमानी ,

देश की खातिर जान देते हैं हम हिन्दुस्तानी ,



समझ में आई बीत चूका आये मुंगल और अंग्रेज ,

त्राहिमाम हम कर रहे थे भूलने लगे मतभेद ,

अलग अलग जो हम बटे थे आये एक धारा में ,

पूरा हिदुस्तान हमारा बुलंदी आई इस नारा में ,

मर मिटने पर तैयार हुई एक टोली… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on September 14, 2010 at 3:41pm — 5 Comments

::::: हिंदी दिवस (क्या इस दिवस का नाम लेने भर की भी हैसियत है हमारी ?) :::: ©

::::: हिंदी दिवस :::::

::::: (क्या इस दिवस का नाम लेने भर की भी हैसियत है हमारी ?) :::: ©



हिंदी हिंदी हिंदी !!!

► . . . आज सभी इस शब्द केपीछे पड़े हैं, जैसे शब्द न हुआ तरक्की पाने अथवा नाम कमाने का वायस हो गया l खुद के बच्चे अंग्रेजी स्कूल में चाहेंगे और शोर ऐसा कि बिना हिंदी के जान निकल जाने वाली है l अरे मेरे बंधु यह दोगलापन किसलिए ? स्वयं को धोखा किस प्रकार दे लेते हैं हम ? किसी से बात करते समय खुद को अगर ऊँचे… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 14, 2010 at 1:30pm — 9 Comments

दो शब्द हिन्दी दिवस पर...

दो शब्द हिन्दी दिवस पर: 14 सितम्बर की बधाई



हिम तुल्य शितल, न्याय तुल्य निश्चल, दीप तुल्य उज्जवल

तीन अक्षर का संगम हिन्दी! सुबोध भाव अति निर्मल



अभिन्न भेष-भुषा सस्ंकृति से मान बढ़े लोकप्रियता का

केवल नागरिकता नहीं उचित परिचय राष्ट्रीयता का

भारतीयता का पूर्णतः प्रतीक हिन्दी बोल विशिष्ट विमल



वर्णित भारतीय सविंधान में है प्रस्तावना का प्रालेख

स्वीकृति सम्पूर्ण भारत में हो हिन्दी नियमित उल्लेख

कारण कई उत्तमता का लिपि सहज सरस सरल



गगन… Continue

Added by Subodh kumar on September 14, 2010 at 7:00am — 4 Comments

तीन पद: संजीव 'सलिल'

तीन पद:

संजीव 'सलिल'

*

धर्म की, कर्म की भूमि है भारत,

नेह निबाहिबो हिरदै को भात है.

रंगी तिरंगी पताका मनोहर-

फर-फर अम्बर में फहरात है.

चाँदी सी चमचम रेवा है करधन,

शीश मुकुट नगराज सुहात है.

पाँव पखारे 'सलिल' रत्नाकर,

रवि, ससि, तारे, शोभा बढ़ात है..

*

नीम बिराजी हैं माता भवानी,

बंसी लै कान्हा कदम्ब की छैयां.

संकर बेल के पत्र बिराजे,

तुलसी में सालिगराम रमैया.

सदा सुहागन अँगना की सोभा-

चम्पा, चमेली, जुही में… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on September 13, 2010 at 11:33pm — 3 Comments

तुम्हें नरसिंह बनना होगा

तुम मुझे जो भी कह लो

सुन लूंगा चुपचाप

चाहे मुझे तुम

पाखंडी /देशद्रोही /बलात्कारी

व्यवस्थाओ को तोड़ने वाला

या फिर उग्रवादी विचारों वाला कह लो

तुम जानते हो /इन बातों से

मैं तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता ॥





भला , सिर्फ विचारों के प्रहार से

क्या बिगड़ेगा तुम्हारा

जरा ,..एक चोर को चोर कह कर देखो

कुरूरता के भयानक पंजे

चीथड़े -चीथड़े कर देगी तुम्हें

अरे ..छोड़ो ....

सच का सामना कितने लोग करते है ॥



जानता हूँ… Continue

Added by baban pandey on September 13, 2010 at 10:45pm — 5 Comments

देखो ना यार मेरा दिल खो गया ,

देखो ना यार मेरा दिल खो गया ,

प्यार प्यार प्यार प्यार प्यारहो गया ,

आखो में मेरे ओ आके बसे हैं ,

ना जाने क्यू ये मन यु झूमे हैं ,

लगता हैं ये दिल उनका हो गया ,

प्यार प्यार प्यार प्यार प्यारहो गया ,



उनके ही संग ये दिल चलना चाहे ,

उनकी ही राह देखे ये मेरी बाहे ,

ओ आये तो मौसम सुहाना ,

खुसबू से दिल हो जाये दीवाना ,

जानू ना यार मुझे क्या हो गया ,

प्यार प्यार प्यार प्यार प्यारहो गया ,



उनके ही चाहत में जियेंगे मरेंगे ,

उनके… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on September 13, 2010 at 8:30pm — 3 Comments

इंसानियत का फ़र्ज़

इंसानियत का फ़र्ज़



डेंगू का कहर देखकर

बेचारे मच्छर भी शरमा गए

अपनें तो पीछे हट गए

बेचारे मच्छर मदद को आ गए

कहनें लगे ना घबराना

हम इंसानियत का फ़र्ज़ निभाएँगे

आपके अपनें तो धोखा दे गए

हम ब्लड डोनेशन को ज़रूर आएँगे

अपना खून देकर भी

हम आपको ज़रूर बचाएँगे

जितना आपसे चूसा था

उससे दुगुना देकर जाएंगे

अपनी तो मज़बूरी थी

ना पीते तो कैसे जीते

लेकिन आपकी खातिर हम

बिन पिए मर जाएंगे

लेकिन आपके अपनों की तरह

पीठ… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 13, 2010 at 2:56pm — 1 Comment

पैरोडी :भाई मीडिया तो सच ही दिखात है !

पैरोडी



सखी सैयां तो खूब ही कमात है,महंगाई डायन खाए जात है की धुन पर आधारित



भाई मीडिया तो सच ही दिखात है

शीला जलत भुनत जात है

हत्थनी कुण्ड करे बँटाधार है

बरसात कहर ढाए जात है

भाई मीडिया तो सच -----

सारी दिल्ली है बेहाल

आई फ्लू ,डेंगू की है मार

डाक्टर हो रहे मालामाल

कॉमनवेल्थ सुसरी सर पे सवार है

बरसात कहर ढाए जा-------

भाई मीडिया तो सच ही-----

जहाँ भी देखो जाम ही जाम

सड़कों पर भी चल रही नाव

दिल्ली का जीवन… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 13, 2010 at 2:30pm — 3 Comments

एक शायर की अभिलाषा !!

आग हूँ कुछ पल दहक जाने की मोहलत चाहता हूँ ,



दर्द को पीकर बहक जाने की मोहलत चाहता हूँ.





फिर बिखर जाऊँगा एक दिन पिछले मौसम की तरह ,



फूल हूँ कुछ पल महक जाने की मोहलत चाहता हूँ,





पहले कीलें ठोकिये पहनाईए काँटों का ताज ,



फिर मैं सूली पर लटक जाने की मोहलत चाहता हूँ.





आपकी इन बूढ़ी आँखों का सहारा बन सकूं ,



इसलिए बाबा शहर जाने की मोहलत चाहता हूँ.





कतरा कतरा चूसकर हर शख्स मीठा हो गया… Continue

Added by Abhinav Arun on September 12, 2010 at 10:38pm — 14 Comments

मेरी चाहत

इस तरह से तेरी मुहब्बत दिल में समाई है

यूं जिन्दगी मेरी है पर तेरी लगे परछाई है



चाहे शमा की रोशनी चाहे नूर आफताब की

बगैर तेरे हरसू ता़रीकी हर जगह सियाही है



दौलत शोहरत आगोश में रहे सियासत दुनिया का

जब तुं नहीं दिल में हर मोड़ पर तन्हाई है



तुझे यकीं हो न शायद है दिल को एहसास मगर

बदले करवट मेरे जज़्बात जब लेती तुं अंगराई है



धड़कन तेरे दम से है बरकरार सांस सीने में

वजूद मेरी निशां तेरी उल्फत की खुदनुमाई है



और क्या कहे शरद… Continue

Added by Subodh kumar on September 12, 2010 at 9:30pm — 2 Comments

bewafai

उनकी यादो से हमने दोस्ती कर ली,
उसकी परछाई से मोहब्बत कर ली,
उन्होंने बेवफा समजा तो क्या गम है,
बेवफाई से भी हमने वफ़ा कर ली.

Added by rohit kumar sahu on September 12, 2010 at 6:16pm — 2 Comments

ये जानता हूँ मैं

ये जानता हूँ मैं कि जिंदगी में जिंदगी मिलती नहीं है कभी,

पर फिर भी जिंदगी भर जिंदगी को तलाश रहा हूँ मैं ,



ये जनता हूँ मैं कि वो आसंमा से उतरी परी है,

फिर भी आदमी हो कर उसे छु लेना चाहता हूँ मैं,



ये जानता हूँ मैं कि इजहारे मुहब्बत एक तूफ़ान है ,

पर फिर भी इस तूफ़ान से गुजर जाना चाहता हूँ मैं,





ये जनता हूँ मैं इस जहां से तनहा ही जाऊंगा मैं,

पर फिर भी हर लम्हा उसे याद करता हूँ मैं,



ये जानता हूँ मैं कि उस से लब्ज दो लब्ज भी कह नहीं… Continue

Added by vinay sharma on September 11, 2010 at 2:30pm — 3 Comments

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