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लक्ष्मण रामानुज लडीवाला's Blog – September 2013 Archive (5)

कुंडलिया छंद

देते है आशीष वे, सर पर रखते हाथ

मन में श्रद्धा भाव हो, तभी श्राद्ध यथार्थ |

तभी श्राद्ध यथार्थ, सभी है उनकी माया

समझों वे है साथ, मिले उनकी ही छाया

मिले सभी संस्कार संज्ञान में जो लेते

माने हम उपकार,  पूर्वज ख़ुशी ही देते |

 …

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 25, 2013 at 10:30am — 17 Comments

मुक्तक (संदर-हिन्दी दिवस)

आता है हिन्दी दिवस जाने को तत्काल

संसंद में करते रहे, नेता टालम टाल

विकसित करना देश को तो मन में यह ठान

अपनी भाषा का सदा उन्नत रखना भाल |

(2)

हिन्दी में ही बोलकर रख भाषा का मान

भाषा की सम्पन्नता, है हिन्दी की शान

हीन भाव लाये बिना कर हिन्दी में बात

तब हिन्दी की विश्व में अमिट बने पहचान |

(3)

रोज मना हिन्दी दिवस करना गौरव गान

देवनागरी लिपि बनी, जो है इसकी शान

संस्कृति अरु साहित्य का उन्नत है भण्डार

सबको…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2013 at 10:00am — 17 Comments

कुंडलिया छंद-लक्ष्मण लडीवाला

(1)

कन्या होती भाग्य से,रखना इसका मान

कन्या घर में आ रही, ले गौरी  वरदान |

ले गौरी वरदान,  आँगन कुटी मह्कावे,

घर आँगन चमकाय,कुसुम कलियाँ खिलजावे

शिक्षा का हो भान, बनावे शिक्षित सुकन्या

रखती मन में धैर्य,कष्ट सहती है कन्या

.

(2)

जन्मे बेटी भाग्य से, घर को दे मुस्कान

पालन -पौषन  साथ ही, पावे  शिक्षा ज्ञान |

पावे  शिक्षा ज्ञान, समाज बने संस्कारी   

नारी का हो मान, करे…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 12, 2013 at 11:30am — 15 Comments

शिक्षक दिवस पर - लक्ष्मण लडीवाला

शिक्षक दिवस पर ओ बी ओ के सभी सुधि प्रबुद्ध गुरुजनों को जिनसे छंद विधा और सत-साहित्य ज्ञान की वृद्धि कर पाया, उन्हें सादर प्रणाम करते हुए महान शिक्षक की जयंती पर प्रस्तुत है - 
 
 
डॉ राधा कृष्णन जैसे शिक्षक से ही बनता देश महान है
अचकन पायजामा पगड़ी उनकी सांस्कृतिक पहचान है 
दर्शन शास्त्र के ज्ञाता जगत को दे गये  अनूठा ज्ञान है 
शिक्षक दिवस पर नतमस्तक हो करते हम सम्मान है 
 
"सेतु" दर्शन के निर्माता वे…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 5, 2013 at 10:30am — 18 Comments

यह कैसा व्यापार (दोहे)

जादू  टोने टोटके,  फैले पाँव पसार,
श्याणे भौपे कर रहे,जिस्मों का व्यापार । 
 
झांड़-फूक के आड़ में, करते रहे शिकार,
धर्म जगत बदनाम हो,यह कैसा व्यापार । 
 
परम्परा के नाम पर, बढे अंध-विश्वास,
तत्व-बोध जाने बिना, क्यो कर रहे प्रयास । 
 
ड़ायन कहकर दागते, जीना करे हराम,
पागल कहकर साधते, तांत्रिक अपना काम । 
 
पाने की हो लालसा, बढ़ता जावे लोभ,
भाग्य…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 1, 2013 at 1:30pm — 24 Comments

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