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महिला दिवस पर रचित दोहे -


मही रूप देवी धरे, धैर्य गुणों की खान
साहस की प्रतिमूर्ति भी, नारी को ही मान | 

सृष्टि सृजनकर्ता यही,यही मही का अर्थ,
रणचण्डी भी बन सके, नारी सभी समर्थ ।

महिला से महके सदा,घर आँगन में फूल
वही सजाती घर सदा, मौसम के अनुकूल ।

जीवन के हर रूप में, नारी मन उपहार,
आलोकित जीवन करे, खुशियों के त्यौहार ।

घर की लक्ष्मी से सदा, सजता है घरबार,
घर आँगन इनसे खिले,इनसे सदा बहार ।

नारी का अपमान हो, सारे व्यर्थ विधान
मूक बने शासक जहाँ, बढे वही हैवान ।

नारी की ही कोख में,पूत रहे नो माह
नारी के सहयोग से,खुले जगत की राह ।

नारी करती नौकरी, उत्पीड़न को झेल,
समता के अधिकार में बाधक है यह खेल ।

दो मन है मन्दोदरी, करे पिया से प्यार
बचे नहीं सिंदूर तब,साजन का उद्धार ।

नारी तू अबला नहीं,अपनी ताकत जान
दोषी से कर सामना, पूरे कर अरमान ।


(मौलिक व अप्रकाशित)
- लक्ष्मण रामानुज लडीवाला

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 16, 2017 at 12:04pm

उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार आपका श्री महेंद्र कुमार जी | सादर 

Comment by Mahendra Kumar on March 14, 2017 at 9:38am
नारी को केंद्र में रखकर बढ़िया दोहे लिखे हैं आपने आदरणीय लक्ष्मण रामानुज जी। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 10, 2017 at 1:20pm

 दोहों सराहने के लिए क्रिया जनाब मोहम्मद आरिफ साहब |

Comment by Mohammed Arif on March 9, 2017 at 6:52pm
आदरणीय रमानुज जी आदाब, नारी की गरीमा-गौरव को रेखांकित खरते आपके दोहों की जितनी प्रशंसा करूँ कम है । बधाई!बधाई!!बधाई!!!

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