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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – April 2019 Archive (2)

गज़ब करता है अय्यारी.......तरही ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

गज़ब करता है अय्यारी ज़माने से ज़माना भी

हक़ीक़त जो है इस पल में है कल का वो फ़साना भी

न मानो तो सकल संसार है इक शै महज़, लेकिन

हर इक शै ज्ञान का खुद में है अतुलित इक खज़ाना भी

बहुत अलगाव का परचम उठाए फिर लिए यारों

समय कहता है आवश्यक हुआ सबको मिलाना भी

उन्होंने पूछा उसको किस लिए फ़िलवक्त चुप है वो

समंदर हौले से बोला है इक तूफाँ उठाना भी

बहाते नीर हो क्यूँकर, जो बादल से कहा…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 28, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

यार पंकज, चुन सुकूँ, रख बन्द आँखें, मौन धर-----ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

मौन रह अपनी ज़रूरत के लिए ए मित्रवर

तू समस्याओं पे काहें को फ़िराता है नज़र

यूँ भी सदियों से लुटेरे आबरू लूटा किए

रोकने की क्या ज़रूरत लूट लेंगे अब अगर

चाय अपनी दाल रोटी चल रही दासत्व से

तो भला ज़िद ठान बैठा है तू क्यूँ सम्मान पर

साख़ पर उल्लू हैं लाखों क्या हुआ, जाने भी दे

छोड़ चिंता बाग की, बस धन पे रख अपनी नज़र

क्या गरज तुझको पड़ी क्यूँ नींद अपनी खो रहा

यार पंकज, चुन सुकूँ, रख बन्द…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on April 17, 2019 at 1:27pm — 7 Comments

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