दरियादिल हो बाप जब, करता कन्यादान।
दयावान भगवान हो, रखता उसका मान।
रखता उसका मान, भात नरसी-सा भरता।
आठ पहर धन-धान्य, वस्त्र की वर्षा करता।
कहते कवि 'कल्याण', मिले तब जीवन साहिल।
करके कन्यादान, दिखाए जब दरियादिल।।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on March 31, 2026 at 8:30pm — No Comments
प्यादे— बेकसूर, बेख़बर, नियति और नीति से अनजान—
अक्सर मान लिये जाते हैं
मात्र एक संख्या भर।
तैनात कर दिये जाते हैं महाराज-महारानी के गिर्द रक्षा-कवच बनकर,
और उसी क्षण
उनकी पहचान सिमट जाती है—
एक संख्या भर।
वे मात खाते हैं, कभी मात दिलाते भी हैं, गिरते हैं, उठते हैं,
और फिर गिरा दिये जाते हैं—
इतनी सहजता से
कि किसी को
कोई फ़र्क नहीं…
Added by amita tiwari on March 30, 2026 at 10:31pm — No Comments
Added by Sushil Sarna on March 23, 2026 at 1:53pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . . अधर
अधरों को अभिसार का, मत देना इल्जाम ।
मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।
उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।
अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।
अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम ।
जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।
अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।
स्पर्शों के दौर में , बिखर गये सब जाम ।।
अधर दलों पर डोलता, जब दिल का ईमान ।
बेशर्मी के पार सब, दिल करता सोपान ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on March 17, 2026 at 2:29pm — No Comments
Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:05am — No Comments
Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:02am — No Comments
Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:00am — No Comments
दोहा सप्तक. . . . . युद्ध
हरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।
बेबस जनता भोगती , इसका हर अंजाम ।।
दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।
जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।
कौन करेगा आकलन , कितना हुआ विनाश ।
मौन भयंकर छा गया, काला हुआ प्रकाश ।।
जंग चलेगी जब तलक, होगा बस संहार ।
खण्डहरों के ढेर पर, सब होंगे लाचार ।।
जन-धन का हर युद्ध में, होता है नुकसान ।
हार- जीत के द्वन्द्व में, हारे बस इंसान ।।
देख विदारक दृश्य को,…
ContinueAdded by Sushil Sarna on March 13, 2026 at 2:49pm — No Comments
ग़ज़ल 2122 1212 22
वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है
कितने दुःख दर्द से भरा दिल है
ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती
पास उनके जो सुनहरा दिल है
ताज इक सब के मन के अंदर भी
और ये शह्र आगरा दिल है
दिल लगी दिल्लगी नहीं होती
इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है
देखकर उनकी मदभरी आँखें
खो गया मेरा मदभरा दिल है
याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'
आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है
मौलिक एवं…
ContinueAdded by Jaihind Raipuri on March 4, 2026 at 10:00pm — 2 Comments
२२१/२१२१/१२२१/२१२
***
पीछे गयी है छूट जो होली गुलाल की
साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।
*
कहने को आयी देश में इक्कीसवीं सदी
होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।
*
कहने को पर्व रंग का, मस्ती मजाक का
पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।
*
रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी
साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।
*
माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े
टेढ़ी करो न रोष में रेखा को भाल की।५।…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2026 at 7:30am — No Comments
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