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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – February 2021 Archive (8)

जग मिटा कर दुख सुनाने- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२

मत निकल तलवार लेकर

जय  मिलेगी  प्यार लेकर।१।

*

युद्ध  नित   बर्बाद  करता

जी तनिक यह सार लेकर।२।

*

जग मिटा कर दुख सुनाने

जायेगा  किस  द्वार लेकर।३।

*

इस भवन का क्या करूँगा

तुम  गये   आधार   लेकर।४।

*

नेह की दुनिया अलग है

हो जा हल्का भार लेकर।५।

*

बोझ सा हरपल है लगता

दब  गये  आभार  लेकर।६।

*

कर गया कंगाल सब को

हर  भरा  सन्सार  लेकर।७।

*

टूटती  रिश्तों  की माला

जोड़ ले कुछ तार…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 26, 2021 at 10:38pm — 4 Comments

रातें तमस भरी हैं उलझन भरे दिवस हैं-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२२/२२१/२१२२



वैसे तो उसके  मन  की  बातें  बहुत सरस हैं

पर काम  इस  चमन  में  फैला  रहे तमस हैं।१।

*

पहले भी थीं न अच्छी रावण के वंशजों की

अब  राम  के  मुखौटे  कैसी  लिए  हवस  हैं।२।

*

ये दौर  कैसा  आया  मर  मिट  गये  सहारे

चहुँदिश यहाँ जो दिखतीं टूटन भरी वयस हैं।३।

*

पसरी  जो  आँगनों  में  उन से  हवा लड़ेगी

इन से लड़ेंगे  कैसे  जो  मन  बसी उमस हैं।४।

*

उस गाँव में हैं  अब  भी  बेढब सुस्वाद…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 21, 2021 at 9:19am — 10 Comments

पहरूये ही सो गये हों जब चमन के- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२



बेड़ियाँ टूटी  हैं  बोलो  कब स्वयम् ही

मुक्ति को उठना पड़ेगा अब स्वयम् ही।१।

*

बाँधकर  उत्साह  पाँवों  में चलो बस

पथ सहज होकर रहेंगे सब स्वयम् ही।२।

*

पहरूये ही सो गये हों जब चमन के

है जरूरत जागने की तब स्वयम् ही।३।

*

अब न आयेगा  यहाँ  अवतार हमको

करने होंगे मान लो करतब स्वयम् ही।४।

*

कल जो सेवक  हैं कहा करते थे देखो

हो गये है  आज  वो  साहब  स्वयम्…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2021 at 7:30am — 14 Comments

कच्ची कलियाँ क्यों मरती - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२२२/२२२२/२२२२



काँटा चुभता अगर पाँव को धीरे धीरे

आ जाते हम  यार  ठाँव को धीरे धीरे।१।

*

कच्ची कलियाँ क्यों मरती बिन पानी यूँ

सूरज छलता  अगर  छाँव को धीरे धीरे।२।

*

खेती बाड़ी सिर्फ कहावत होगी क्या

निगल रहा है नगर गाँव को धीरे धीरे।३।

*

कौन दवाई ठीक करेगी बोलो राजन

पेट देश के लगी  आँव को धीरे धीरे।४।

*

जीत कठिन भी हो जाती है सरल उन्हें

जो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 14, 2021 at 7:38am — 8 Comments

इस बार भी करेंगे ये सौदा किसान का -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२



पहने हुए हैं जो भी मुखौटा किसान का

हित चाहते नहीं हैं वो थोड़ा किसान का।१।

*

बन के हितेशी नित्य हित अपना साधते

बाधित करेंगे ये ही तो रस्ता किसान का।२।

*

नीयत है इनकी खोटी ये करने चले हैं बस

दस्तार अपने हित में दरीचा किसान का।३।

*

होती इन्हें तो भूख है अवसर की नित्य ही

चाहेंगे पाना खून पसीना किसान का।४।

*

स्वाधीन हो के देश में किस ने उठाया है

रुतबा किया सभी ने है नीचा किसान का।५।

*

सब के टिकी हुई है ये…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 7, 2021 at 10:28am — 10 Comments

हम तो हल के दास ओ राजा-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२/२२/२२/२२



हम तो हल के दास ओ राजा

कम देखें  मधुमास  ओ राजा।१।

*

रक्त  को  हम  हैं  स्वेद  बनाते

क्या तुमको आभास ओ राजा।२।

*

अन्न तुम्हारे पेट में भरकर

खाते हैं सल्फास ओ राजा।३।

*

पीता  हर  उम्मीद  हमारी

कैसी तेरी प्यास ओ राजा।४।

*

हम से दूरी  मत  रख इतनी

आजा थोड़ा पास ओ राजा।५।

*

खेती - बाड़ी  सब  सूखेगी

जो तोड़ेगा आस ओ राजा।६।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2021 at 9:56am — 23 Comments

ये लहर ऐसे न साथी साथ देगी अब यहाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



हर लहर से बढ़ के अब तो रार साथी तेज कर

पार  जाने  के  लिए  पतवार  साथी  तेज  कर।१।

*

ये  लहर  ऐसे  न  साथी  साथ  देगी  अब  यहाँ

झील के  पानी  में  थोड़ी  मार  साथी तेज कर।२।

*

जुल्म  के  पत्थर  इसी  से  कट  गिरेंगे  देखना

पहले पत्थर पर कलम की धार साथी तेज कर।३।

*

काट दी है जीभ इन की चीखना सम्भव नहीं

सच कहेंगी  बेड़ियाँ  झन्कार  साथी  तेज…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2021 at 7:58pm — 10 Comments

यूँ तो जनता की रही सरकार कहने के लिए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२

.

शेष इस में  क्या  रहा  इनकार  कहने के लिए

कह गया कनखी में सब दरवार कहने के लिए।१।

*

काम जनता के न आयी आज तक ये एक दिन

यूँ तो जनता  की  रही  सरकार  कहने के लिए।२।

*

इश्तहारों के सिवा जनहित का उसमें कुछ नहीं

शेष है बस  नाम  ही  अखबार  कहने के लिए।३।

*

काम कोई भी किया ऐसा न जिसका दम भरें

बात ही  उस की  रही  दमदार  कहने के लिए।४।

*

सब दिहाड़ी पर  बुलाए  उस के ही मजदूर थे

लोग जितने  भी  जुटे  आभार  कहने के…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2021 at 3:30am — 3 Comments

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