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रातें तमस भरी हैं उलझन भरे दिवस हैं-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२२/२२१/२१२२


वैसे तो उसके  मन  की  बातें  बहुत सरस हैं
पर काम  इस  चमन  में  फैला  रहे तमस हैं।१।
*
पहले भी थीं न अच्छी रावण के वंशजों की
अब  राम  के  मुखौटे  कैसी  लिए  हवस  हैं।२।
*
ये दौर  कैसा  आया  मर  मिट  गये  सहारे
चहुँदिश यहाँ जो दिखतीं टूटन भरी वयस हैं।३।
*
पसरी  जो  आँगनों  में  उन से  हवा लड़ेगी
इन से लड़ेंगे  कैसे  जो  मन  बसी उमस हैं।४।
*
उस गाँव में हैं  अब  भी  बेढब सुस्वाद वाले
इस आधुनिक  नगर  में  रिश्ते  हुए विरस हैं।५।
*
पथ ढूँढता है हर पल भटका हुआ 'मुसाफिर'
रातें  तमस  भरी  हैं  उलझन  भरे  दिवस  हैं।६।


(१०-१-२१)

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

आ. भाई गुमनाम जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति , प्रशंसा और स्नेह के लिए आभार ।

Comment by gumnaam pithoragarhi on Wednesday

वाह बहुत खूब ग़ज़ल हुई है बधाई ......

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday

आ. भाई क्रिस जी, अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 21, 2021 at 6:43pm

 बेहतरीन ग़ज़ल हुई आदरणीय भैया बहुत बहुत बधाई।

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