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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – January 2022 Archive (4)

दोहा सप्तक -७( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

मन्थन कर के सिन्धु का, बँटवारे में कन्त

राजनीति को क्यों दिए, बहुत विषैले दन्त।१।

*

दुख को तो विस्तार है, सुख में लगा हलन्त

ऐसी हम से भूल क्या, कुछ तो बोलो कन्त।२।

*

वैसे कुछ तो बाल भी, कहते सत्य भदन्त

मन छोटी  सी  कोठरी, बातें  रखे अनन्त।३।

*

आया है उत्कर्ष का, यहाँ न एक बसन्त

केवल पतझड़ में जिये, यूँ जीवन पर्यन्त।५।

*

सुख तो मुर्दा देह सा, केवल दुख जीवन्त

जाने किस दिन आ स्वयं, ईश करेंगे अन्त।४।

*

कहलाने की होड़ में,ओछे लोग…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 27, 2022 at 8:43pm — 2 Comments

शिशिर के दोहे -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

ठण्ड कड़ाके की पड़े, सरसर चले समीर।

नित्य शिशिर में सूर्य का, चाहे ताप शरीर।१।

*

दिखे शिशिर में जो नहीं, गजभर दूरी पार।

लगता  धरती  से  हुआ, अम्बर  एकाकार।२।

*

धुन्ध लपेटे भोर तो, विरहन जैसी साँझ।

विधवा लगते वृक्ष हैं, धरती लगती बाँझ।३।

*

घना कुहासा ढब घिरे, झरे हवा से नीर।

बदली जैसी भीत भी, धूप न पाये चीर।४।

*

देती है हिम खण्ड सा, शीतलहर अहसास।

चन्दा जैसा दीखता, सूर्य  क्षितिज के पास।५।

*

हुए वृक्ष सब काँच से, हिम की ओढ़…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2022 at 7:16am — 4 Comments

मकर संक्रांति के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

आया है जन पर्व जो, मकर संक्रांति आज।

गंगा तट पर सब  जुटे, छोड़  सकारे काज।१।

*

आज उत्तरायण हो चले, मकर राशि पर सूर्य।

हर घाट शंखनाद  अब, बजता  चहुँदिश तूर्य।२।

*

निशा घटे बढ़ते दिवस, बढ़ता सूर्य प्रकाश।

भर देते हैं इस  दिवस, कनकौवे  आकाश।३।

*

विविध प्रांत, भाषा यहाँ, भारत देश विशाल।

विविध पर्व भी हैं  मगर, मनें  सनातन चाल।४।

*

गंगा में डुबकी  लगा, करते हैं सब स्नान।

करते पाने पुण्य फिर, अन्न धन्न का दान।५।

*

कहो मकर संक्रांत…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 14, 2022 at 10:39am — 3 Comments

दोहा सप्तक -६( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )

रह कर अपनी मौज में, बहना  नित चुपचाप

सीख सिन्धु से सीख ये, जीवन पथ को नाप।।

*

जन सम्मुख जो दे रहे, आपस में अभिशाप

सत्ता को करते  मगर, वो  ही  भरत मिलाप।।

*

शासन  भर  देते रहे, जनता  को सन्ताप

सत्ता बाहर बैठ अब, करते बहुत विलाप।।

*

बचपन से ही बन रहे, जो गुण्डों की खाप

राजनीति की छाँव में, रहे नोट नित छाप।।

*

दुख वाले घर द्वार पर, सुख देता जब थाप

उड़ जाते  हैं  सत्य  है, बनकर  आँसू भाप।।

*

कह लो  चाहे  तो  बुरा, चाहे अच्छा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 4, 2022 at 8:47pm — 8 Comments

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