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November 2014 Blog Posts

ग़ज़ल (आलोक मित्तल)

कौन आया है अजनबी देखो !

खुशनुमाँ आज जिन्दगी देखो II

ध्यान देना ज़रा नजर भरके !

बैठ कर खूब सादगी देखो II

देख लो ठोक औ बजा करके I

ठीक सा कोइ आदमी देखो II

प्यार का अब हुआ असर ऐसा !

आप इसकी नई कमी देखो !!

हर तरफ चल रही सफाई है !

पर फिजाओं में गंदगी देखो !!

देखिये बँट रही मिठाई है !

कौन है फिर यहाँ दुखी देखो !!

जीत ली प्यार से मुहब्बत भी !

आज आलोक की ख़ुशी देखो…

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Added by Alok Mittal on November 1, 2014 at 4:00pm — 14 Comments

पूजा का वो थाल लगी

साड़ी में जैसे फाल लगी

डाली में जैसे डाल लगी

 

मैं भी कुछ खिल जाउंगा

वो आके जब गाल लगी

 

धीरे से पाती खोल रहीं

तबले पे जैसे ताल लगी

 

नज़रों की  चोली ओढ़ेगी

मालों में  जो माल लगी

 

असीर हैं  अनचाहे हम  

मछली का वो जाल लगी

  

इत्र गुलाबी  खुशबू फैली

पूजा का वो थाल लगी

 

अजब सलीके कत्ल किया

चैन की वो ही काल  लगी

 

गाली भी  खिल जाएगी

मुखड़े से जब…

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Added by anand murthy on November 1, 2014 at 1:30pm — 5 Comments

क्षणिकाएँ...

क्षणिकाएँ...

1.घन गरजे घनघोर

तिमिर चहुँ ओर

तृण-तृण से तन बहे

करके सब कुछ शांत

मेह हो गया शांत

..........................

2. सावन की फुहार

सृजन की मनुहार

रंगों का अम्बार

आयी बहार

हुआ धरा का

पुष्पों से शृंगार

.......................

3.बुझ गयी

कुछ क्षण जल कर

माचिस की तीली सी

जंग लड़ती साँसों से

असहाय ये काया

.........................

4.हर शाख पर

शूल ही शूल

फिर भी महके…

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Added by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 1:15pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?(ग़ज़ल 'राज' )

१२२ १२२ १२२ १२२

नहीं पाँव दिखते जहाँ पर  खड़े हो

बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?

 

उड़ाया जिसे ठोकरों से हटाया

उसी ख़ाक के तुम छलकते घड़े हो

 

जमाना नया है नयी नस्ल आई

पुराने चलन पर अभी तक अड़े हो

 

झुकी कायनातें झुका आसमां तक

न सोचो खुदी को फ़लक पे जड़े हो

 

वही रास्ते हैं वही मंजिलें हैं

वही कारवाँ है मगर तुम छड़े हो 

 

जहाँ है मुहब्बत वहीँ हैं उजाले

निहाँ तीरगी है जहाँ गिर पड़े हो…

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Added by rajesh kumari on November 1, 2014 at 12:45pm — 32 Comments

"जी उठा मन"

जी उठा मन” - गीतिका

 

जी उठा मन आज फिर से रात चंदा देखकर  |

थक गई थी प्रीत जग की रीत भाषा देखकर |



इक किरण शीतल सरल सी जब बढ़ी मेरी तरफ ,

झनझनाते तार मन उज्वल हुआ सा देखकर |



छू लिया फिर शीश मेरा संग बैठी देर तक ,

खूब बातें कर रही थी मुस्कुराता देखकर |



प्यार से बोली किरण फिर संग तुम मेरे चलो ,

राह रोशन कर रही थी साथ भाया देखकर |



चांदनी का चीर…

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Added by Chhaya Shukla on November 1, 2014 at 10:00am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल -हर ग़ज़ल में आप ही तो हैं (गिरिराज भंडारी)

1222     1222    1222       1222

मेरी हर शायरी में हर ग़ज़ल में आप ही तो हैं

मेरे हर नज़्म की होती पहल में आप ही तो हैं

 

मुझे तो ज़िन्दगी के रंग सारे ठीक लगते थे

किसी भी रंग के रद्दोबदल में आप ही तो हैं

 

मैं कितनी भी रखूँ दूरी हमेशा पास में हो आप 

मेरे दिल में बना है उस महल में आप ही तो हैं

 

ये दुनिया है यहाँ ज़ह्राब भी शामिल है आँसू भी

मेरी आँखों से बहते इस तरल में आप ही तो हैं

 

अलग कब आप हो…

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Added by गिरिराज भंडारी on November 1, 2014 at 8:00am — 27 Comments

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