For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

मिला नज़र से नज़र, सब्र आज़माते रहे,

1212 1122 1212 22  .... अंतिम रुक्न ११२ भी पढ़ा गया है ..

.

नज़र, नज़र से मिला, सब्र आज़माते रहे,

मेरे रक़ीब मुझे देख, तिलमिलाते रहे.  

घटाएँ, रात, हवा, आँधियाँ करें साज़िश,

मगर चिराग़ ये बेखौफ़ जगमगाते रहे.

.

गुनाह, जुर्म, सज़ा, माफ़ आपकी कर दी,

ये कह दिया तो बड़ी देर सकपकाते रहे.

.

खफ़ा खफ़ा से रहे बज़्म में सभी मुझसे,

वो पीठ पीछे मेरे शेर गुनगुनाते रहे.  

.

मिला हमें न सुकूँ दफ्न कब्र में होकर,

किसी…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on October 20, 2013 at 10:30pm — 26 Comments

गजल: प्यार में कैसी ये त्रासदी हो गई/शकील जमशेदपुरी

बह्र: 212 212 212 212

__________________________

प्यार में कैसी ये त्रासदी हो गई

देख कर पीर पलकें दुखी हो गई



तेरी यादों ने दिल पे यूं दस्तक दिया

आंख बहने लगी औ नदी हो गई



संग तेरे तो बरसों भी पल भर लगा

एक पल की जुदाई सदी हो गई



प्रेम के मानकों पर जो परखा नहीं

भूल बस एक हम से यही हो गई



शेअर ऐसे नहीं हैं जो दिल पर लगे

आज फिर दर्दे दिल में कमी हो गई



कश्मकश में अभी तक पड़ा है ‘शकील’

कैसे इक…

Continue

Added by शकील समर on October 20, 2013 at 5:30pm — 15 Comments

तुम्हारे संग कुछ पल चाहता हूँ - गीत

जानता हूँ जगत मुझसे दूर होगा 

पर तुम्हारे संग कुछ पल चाहता हूँ।

कठिन होगी यात्रा, राहें कँटीली,

व्यंजनायें मिलेंगी चुभती नुकीली,

कौन समझेगा हमारी वेदना को

नहीं देखेगा जगत ये आँख गीली,

प्यार अपना हम दुलारेंगे अकेले

बस तुम्हारे साथ का बल चाहता हूँ।

स्वप्न देखूँ कब रहा अधिकार मेरा

रीतियों में था बँधा संसार मेरा,

आज मन जब खोलना पर चाहता है

गगन को उड़ना नहीं स्वीकार मेरा,

भर चुके अपनी उड़ानें अभी सब…

Continue

Added by Manoshi Chatterjee on October 20, 2013 at 11:19am — 17 Comments

कुण्डलियाँ

कैसा ये जीवन हुआ, दिन प्रति बढ़े विकार

लोभ, मोह, मद, दंभ भी, नित लेते आकार  

नित लेते आकार, स्वार्थ के सर्प अनूठे

बाँट रहे संदेह, नेह के बंधन झूठे

मन में फैली रेह, भाव है ठूंठों जैसा

संवेदन अब शून्य, मूल्य संस्कृति का कैसा

                - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by बृजेश नीरज on October 19, 2013 at 10:30pm — 23 Comments

दीवाली

दीवाली -(चोका)



आई दीवाली

जगमगायें  दीप

सबके द्वारे

माटी से सुरचित

 दीप सुन्दर

रुई की बनी बाती

स्नेह पूरित

तब मिल जलती 

बाती सुन्दर

दे  अपनी उजास

हरे उदासी

उल्लास भर देती 

घर बाहर

सागरसुता  आये

स्वर्ण कलश …

Continue

Added by Jyotirmai Pant on October 19, 2013 at 6:30pm — 9 Comments

गज़ल - रोशनी भी अँधेरे जैसी है |

शाम सी ना सवेरे जैसी है |

रोशनी भी अँधेरे जैसी है |

क्या बताऊ तुम्हें पता घर का,

पूरी बस्ती ही डेरे जैसी है |

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |

उस मुसब्बर की कोई भी मूरत,

तेरे जैसी ना मेरे जैसी है |

हर ख़ुशी जिंदगी के आंगन में,

चार दिन के बसेरे जैसी है |

डौली दुल्हन की जो उठाने चले,

सबकी नीयत लुटेरे जैसी है |

 

डा. विनोद…

Continue

Added by डॉ विनोद लवानिया on October 19, 2013 at 4:30pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
भेज रहा हूँ तुझे निमंत्रण........अरुण कुमार निगम

जीवन क्या है ? तुहिन सूक्ष्म कण

क्यों ना तुझ पर करूँ समर्पण....

दूर्वादल के क्षणिक पाहुने

संग लिये आती है ऊषा

प्राची के आँचल में रश्मि

बिखरा देती है मंजूषा

बीन-बीन ले जातीं किरणें

तुहिन बिंदु सम जीवन के क्षण......

ना द्युति मेरी,ना छवि मेरी

है सारा सौंदर्य पराया

बल गुरुत्व का, देह सँवारे

मन को लुभा रही है माया

तृषा बढ़ाती मृग-तृष्णायें

फैलाकर अपना आकर्षण......

उतरा था कल शून्य व्योम से

कुछ…

Continue

Added by अरुण कुमार निगम on October 19, 2013 at 4:00pm — 19 Comments

मेरे अपने उधारी दे के ऋण को छोड़ देते हैं

मेरे अपने उधारी दे के ऋण को छोड़ देते हैं

मगर फिर नास्ते का दाम उसमें जोड़ देते हैं

 

चलाते योजना अक्सर वो अपने जेब भरने को  

सियासी हैं बड़े नदियों का रुख भी मोड़ देते हैं

 

जो हैं कमजोर दुनिया में करें वो ज्ञान की बातें

बहादुर हैं जो हाँ करवाने सर ही फोड़ देते हैं

 

करे हैं जोंक सी यारी लिपट के यार मतलब से

निकल जाता है जब मतलब वो यारी तोड़ देते हैं

 

हवाएं जब करें साजिश चटक जाते हैं तब फानूश

तमस से जंग…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 19, 2013 at 3:30pm — 10 Comments

बड़ी बातें मियां छोड़ों

१२२२     १२२२

बड़ी बातें मियां छोड़ों 

हमारा दिल न यूं तोड़ों

न हिन्दू है न वो मुस्लिम 

वो हिंदी है उसे जोड़ो 

छलकती हैं जहाँ आँखें 

मुझे रिन्दों वहां छोड़ों 

लगें दिलकश जो  शाखों पे 

हसीं गुल वो नहीं तोड़ों 

मिलेगी वक़्त पर कुर्सी 

मियाँ कुर्सी को मत दौड़ों 

लुटी कलियाँ चमन की हैं 

दरिंदों को नहीं छोड़ों 

बचा कुर्सी वतन बेंचा 

शरारत ये जरा…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on October 19, 2013 at 2:30pm — 18 Comments

गजल: चांदनी आज तेरे छत पे अकेली होगी/शकील जमशेदपुरी

 बह्र: 2122 1122 1122 22

________________________________



जिंदगी और न अब कोई पहेली होगी

फिर से हाथों में मेरे तेरी हथेली होगी



प्यार में ताने सुनाने लगी दुनिया अब तो

क्या पता था मुझे नाम उसके हवेली होगी



कान किसने भरे उसके वो खफा है…

Continue

Added by शकील समर on October 19, 2013 at 1:10pm — 13 Comments

नौकरी के बाद का जीवन -दीपक पांडेय

अध्येता जब मैं था मुझकों थी रोज़गार की लालसा

दूर हो आर्थिक तंगी मेरी - सुधरे अपनी दशा

उच्य हो सामाजिक स्तर कुछ ऐसा हो अपना नौकरीपेशा

उमंग भरे माहौल में होता नित यारों के साथ जलसा



रोज़गार की आस मे दौड़ा- लगा के पूरा दम

मैने फिर नौकरी के परिवेश मे रखा ज्यों कदम

त्यों बदला परिवेश मेरा- दूर हुआ कुछ भ्रम

कार्यालय ही अपना डेरा, कार्यालय ही आश्रम



पराधीन हुआ अब आधा जीवन ,चली गयी आज़ादी

अपनों से दूर होकर के हो गया गुलामी का आदी

खुशियों की… Continue

Added by DEEPAK PANDEY on October 19, 2013 at 12:46pm — 12 Comments

कविता - सूर्योदय

छा रहा है गगन में कुछ कुछ उजाला

बढ़ रही है पूर्व दिशि की लालिमा

जगमगाते तारे भी फीके पड़े हैं

घट रही है यामिनी की कालिमा

चन्द्रमा निस्तेज होकर जा छुपा है

मंद पड़ती श्वेत किरणों को समेटे

चाहता है पश्चिमी दिव्यांगना के

पास जाकर गोद में कुछ काल लेटे

हाथ थामे दिग्वधू का आ रहे हैं

तिमिर के बैरी प्रभु श्री अंशुमाली

मंद वायु भी लगी है मुस्कुराने

छिप गयी है कही जाकर रात काली

हिमगिरी…

Continue

Added by Praveen Verma 'ViswaS' on October 19, 2013 at 12:20pm — 13 Comments

ग़ज़ल (७) : ख़ुदकुशी अच्छी नहीं होती !

बहुत ज्यादा भी हो, पाकीज़गी, अच्छी नहीं होती 

न करना यार मेरे, ख़ुदकुशी, अच्छी नहीं होती//१ 

.

चलो माना, के जीने के लिए, खुशियाँ जरूरी है 

जरा भी ग़म न हो, ऐसी ख़ुशी, अच्छी नहीं होती//२ 

.

भले ही, आह उट्ठे है !!, दिलों से, वाह उट्ठे है !! 

मगर सुन, आँख की, बेपर्दगी अच्छी नहीं होती//३

.

तजुर्बे का, अलग तासीर है, यारों मुहब्बत में 

हमेशा इश्क़ में, हो ताज़गी, अच्छी…

Continue

Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 19, 2013 at 12:19pm — 38 Comments

ग़ज़ल- सारथी || अलग सबसे तबीयत है करें क्या ||

अलग सबसे तबीयत है करें क्या

कि इक बुत से मुहब्बत है करें क्या /१

दुआ में मांगते हैं मौत मेरी

सितमगर की शरारत है करें क्या /२

न कोई आ रहा सुन डुगडुगी अब

मदारी को शिकायत है करें क्या /३

ये आदत छोड़िये जी शाइरी की 

मगर दिल की जरुरत है करें क्या /४

तमाशा देख लो उस नामवर का

लिबासों की इबादत है करें क्या /५

हमें दिल में सनम ने रख लिया है

न मरने की इजाजत है करें क्या /६

अरे अब आसमां मत बांट देना

ज़मीं ने की…

Continue

Added by Saarthi Baidyanath on October 19, 2013 at 12:00pm — 19 Comments

गजल

काँटे हैं किस के पास में किस पे गुलाब है।

जनता के पास आज भी सबका हिसाब है।

.

पढ़कर के जिस किताब को बच्चे बहक गये ,

बोलो र्इमान वालो वो कैसी किताब है।

.

लालो गुहर नही है मेरे पास में मगर ,

जो कुछ भी मेरे पास है वो लाजबाब है।

.

बैठे है करके बंद वो दरवाजे खिड़कियाँ ,

ये सोचकर कि अपना मुकददर खराब है।

.

ये सच है हाथ पाँव में अब जान ही नही ,

जिन्दा लहू में अब भी मेरे इन्कलाब है।

.

अंगार को बुझाइये पानी…

Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 19, 2013 at 11:30am — 8 Comments

नेताओं देश शर्मसार है तुम पर

जवान होते ही हैं

शहीद होने के लिए

और नेता

वह तो शासक है

सोना उनका हक है

जवान जब गोली खा रहा होता है

नेता पार्टी कर रहे होते हैं

जवानों की चिता को

मुखाग्नि भी

राजनीति का अवसर देती है

उन्हें,

शहीदों की

माओं के चाक सीने पर भी

नमक छिड़कने से भी

बाज नही आते

विलाप, क्रंदन भी

अवसर हैं वोट की तिजारत के।

नेताओं

देश शर्मसार है तुम पर।

 



मीना पाठक

 …

Added by Meena Pathak on October 19, 2013 at 8:00am — 29 Comments

कुण्डलियाँ

तेरी कान्हा बांसुरी, छेड़े ऐसी तान

जिसकी धुन में मन रमा, बिसरा सुध-बुध-ध्यान

बिसरा सुध-बुध-ध्यान, मोह के बंधन छूटे

जग माया का जाल, दर्प के दरपन टूटे

हुआ क्लेश का नाश, पीर सब हर ली मेरी

पर ये क्या बैराग? लुभाती है छवि तेरी !!

- बृजेश नीरज 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by बृजेश नीरज on October 18, 2013 at 11:00pm — 29 Comments

घरों मे वो दादी औ नानी हैं कहाँ अब...........

घरों मे वो दादी औ नानी हैं कहाँ अब

बच्चों के सपनों में राजा-रानी हैं कहाँ अब

उम्र से ज़्यादा , क़द बड़े हो गये हैं उनके

कि बच्चों में बच्चों की निशानी हैं कहाँ अब

बुज़ुर्गों की याद भी आए , तो आए कैसे

घरों में कोई भी चीज़ें पुरानी हैं कहाँ अब

नहीं मिलता है , कृष्ण सा क़िरदार कोई

भला दिखती भी मीरा दीवानी हैं कहाँ अब

घर , छतें , घरोंदें हैं , पंछी भी हैं "अजय"

बर्तन में उनके दानें और पानी हैं कहाँ…

Continue

Added by ajay sharma on October 18, 2013 at 10:30pm — 15 Comments

अब मैं पराभूत नहीं

सांझ ढली

कुछ टूटा ,

भर गयी रिक्तता.

सब मूंद दिया कसकर.

अन्दर बाहर अब है,

एक रस.

घुप्प  अँधियारा.

दिवस का…

Continue

Added by Neeraj Neer on October 18, 2013 at 10:30pm — 10 Comments

.....बेखबर .....

अपने दिल से मेरा सिलसिला जोड़ दे ,
द्वार आखों का अपनी खुला छोड़ दे..
.
ऐसी पागल हवायों की औकात क्या
तू जो चाहे तो तूफाँ का रुख मोड़ दे…
.
राह में रोक लेना तो रुसवाई है
साथ चल या मेरा रास्ता छोड़ दे
.
साफ चाहत का जिसमे न चेहरा दिखे।
दिल ये कहता है वो आइना तोड़ दे ...
.
दुःख में आँखें न आ जाएँ तेरी कहीं
रात भर याद में जागना छोड़ दे…।

मौलिक व् अप्रकाशित

Added by Pankaj Mishra on October 18, 2013 at 9:30pm — 8 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Shyam Narain Verma commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"नमस्ते जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर"
22 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"  आदरणीय अशोक भाईजी, श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रोहित डोबरियाल "मल्हार"'s blog post दास्तां
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.  आप…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"  निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर…"
Monday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"वाह वाह वाह .. सावन की कजरी का आधुनिक रूप गुदगुदा गया, आदरणीय आशीष जी.  सही भी है, प्रकृति के…"
Monday
आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Jul 27
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Jul 27
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेयाद तुझे किया था हमने ...कहती थी न ..."क्या...तुम्हारे…See More
Jul 27
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Jul 26
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service