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गज़ल - रोशनी भी अँधेरे जैसी है |

शाम सी ना सवेरे जैसी है |

रोशनी भी अँधेरे जैसी है |

क्या बताऊ तुम्हें पता घर का,

पूरी बस्ती ही डेरे जैसी है |

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |

उस मुसब्बर की कोई भी मूरत,

तेरे जैसी ना मेरे जैसी है |

हर ख़ुशी जिंदगी के आंगन में,

चार दिन के बसेरे जैसी है |

डौली दुल्हन की जो उठाने चले,

सबकी नीयत लुटेरे जैसी है |

 

डा. विनोद लवानिया

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil.Joshi on October 24, 2013 at 7:38pm

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है ............ वाह सुभानअल्लाह....... बधाई हो इस शानदार गज़ल के लिए आ0 डॉ. विनोद जी.....

Comment by Saarthi Baidyanath on October 22, 2013 at 4:52pm

जानदार शेर के लिए दिली दाद हाज़िर है डॉक्टर साहिब 

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |...बेहद कमाल का !...वाह ...अद्भुत :)

Comment by vandana on October 22, 2013 at 7:27am

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |

बहुत बढ़िया सर 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 21, 2013 at 11:15pm

सुन्दर भावो से परिपूर्ण इस ग़ज़ल पर आपको तहे दिल से बधाई |

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 21, 2013 at 12:50pm

बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है ....

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |.... एक दम गुलज़ाराना ...
वक़्त रहता नहीं कहीं टिककर,
इसकी आदत भी आदमी सी है .... क्या कहने .. बधाई  

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 21, 2013 at 12:29pm

आदरणीय विनोद जी ..इस बेहतरीन ग़ज़ल का ये शेर दिल को छू गया 

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |..हार्दिक बधाई के साथ 

Comment by वीनस केसरी on October 21, 2013 at 2:02am

विनोद साहब इस शेर के लिए ढेरो दाद क़ुबूल फरमाएं ....

वक्त गुजरा तो फ़िर नहीं लौटा,

इसकी फ़ितरत भी तेरे जैसी है |

Comment by annapurna bajpai on October 20, 2013 at 11:07pm

डौली दुल्हन की जो उठाने चले,

सबकी नीयत लुटेरे जैसी है |................... बहुत ही बढ़िया । बहुत बधाई आपको आ0 विनोद लवनिया जी । 

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 20, 2013 at 1:40pm

बहुत ही बेहतरीन ...उम्दा....ख्याल....//...............

हर ख़ुशी जिंदगी के आंगन में,

चार दिन के बसेरे जैसी है |...........बधाई हो................आ. विनोद साहब.....!!!

Comment by Meena Pathak on October 20, 2013 at 12:16pm

बहुत खूब, बेहतरीन रचना | बधाई
सादर

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