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इस बार का तरही मिसरा|
"उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है"
वज्न: १२१२१२१२१२१२२२

काफिये के मामले में आप स्वतंत्र है बस इतना ध्यान रखें कि यह मिसरा पूरी ग़ज़ल में कहीं न कही ( मिसरा ए सानी या मिसरा ए ऊला में) ज़रूर आये|

मुशायरे कि शुरुवात शनिवार से की जाएगी| admin टीम से निवेदन है कि रोचकता को बनाये रखने के लिए फ़िलहाल कमेन्ट बॉक्स बंद कर दे जिसे शनिवार को ही खोला जाय|

विशेष : जो फ़नकार किसी कारण लाइव तरही मुशायरा में शिरकत नही कर पाए हैं
उनसे अनुरोध है कि वह अपना बहूमुल्य समय निकाल लाइव तरही मुशायरे की शोभा बढाएं|

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Replies to This Discussion

वाह वाह नविन साहब वाह, आगाज बहुत ही बढ़िया है, क्या शे'र निकाला है, बहुत खूब, दाद देता हूँ ,
समाज में बागी अब कम ही दीखते है चापलूसों की भीड़ है ,चलिए शायरी में ही सही सच कहने में संकोच कैसा .कई बार मर्ज़ पुराना हो तो सूई लगानी ही पड़ती है.
वाह वाह बड़े भैया कमाल के शेर कह गए...और जो मतले में गिरह बांधी है एकदम ज़माने की नब्ज़ पकड़ के बांधी है...और दरख्ते भाईचारा वाला शेर..उफ़..ये मुझे क्यों नहीं सूझा????

बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन
ग़ज़ल के नाम पे जो चुटकुले सुनाते हैं|
फकत जिन्हें कमेंट का किला बनाना है|
उन्हीं के कदमों में ही जा गिरा जमाना है|८|
hahahaahahahaha
nawi n ji aapne shuruwaat ki magar laazawaab tarike se. ek se ek shaandaar sher.
ज़मीनो आसमां को एक जिसने जाना है ,
उन्हीं के कदमो में ही जा गिरा ज़माना है .

बसर वो करते नहीं आज कल दिलो जां में ,
बने खुदा है मगर किस जगह ठिकाना है.

छोड़कर पाप पुण्य का चक्कर ,
उन्होंने ठान लिया गंगा में नहाना है .

सियासी लोग भला डरते कब जमाने से ,
कालिखों के लिए हर रोज एक बहाना है .

कई बरस के बाद आया चुनावी मौसम ,
नए नेताओं के लिए यही नजराना है.

उजड गए सीवान डेरे और दुआरे सब ,
बदल गए से गाँव में भला क्या जाना है.

बहुत उलझ गए हैं उन के ये लच्छे सब,
ये रिश्ते हैं या फकत उनका ताना बाना है.

कताएं नज़्म ग़ज़ल या कि मसनवी "अभिनव "
लिखेंगे कुछ भी मगर आपको सुनाना है.
सियासी लोग भला डरते कब जमाने से ,
कालिखों के लिए हर रोज एक बहाना है .
क्या बात कही है जनाब अभिनव साहिब, बहुत खूब, दाद देता हूँ मैं आप के ख्यालात को,
काफी कुछ सोच कर आया था .वह 'था' हो गया .अब तो इस शौक़ के लिए इधर उधर जानकार , कद्रदान तलाशने पड़ते हैं.मुझे लगता है ये मेरा नहीं सारे साहित्यकारों का दर्द है. आईये इस मंच पर बांटे .यहाँ आकर अच्छा लग रहा है.अप सब का साथ चाहिए. शुक्रिया!!
सबसे पहले तो अभिनव भाई साहब आपका तरही में स्वागत है...
बड़े उम्दा शेर कह गए है आप...मतले में लगाई गिरह बड़ा नेक संदेशा देती है ..और खुदा के ठिकाने वाला शेर ..बदलते रिश्तों पर करारा तंज़ करता है| और मकते में कही गई बात का मै पूरे OBO परिवार की तरफ से स्वागत करता हूँ|

बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन
बहुत अच्छा लग रहा है.आभार!!मैं तो ..

"रोज जीता हूँ रोज मरता हूँ ,
दर्द की मूरतों को गढता हूँ.
अपने से पहले आपको ही ओ .बी .ओ. पर पढ़ा था आपने भी क्या खूब शेर कहे हैं वाह !
"ग़ज़ल के नाम पे जो चुटकुले सुनाते हैं ...बहुत बढ़िया और खालिस यथार्थ .
वाह आज़र साहब वाह, अच्छी ग़ज़ल निकाली है, मुशायरा मे अब मजा आ रहा है, बहुत खूब ,
गुरु जी अपने भी अपनी ग़ज़ल के साथ मुशायरे में शिरकत की मै तहे दिल से आपका शुक्रगुजार हूँ

आपकी ग़ज़ल पर कमेन्ट करना तो मेरे बस की बात ही नहीं है|
बस स्नेह बनाये रखियेगा|

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