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ओबीओ ’चित्र से काव्य तक’ छंदोत्सव" अंक- 61 की समस्त रचनाएँ चिह्नित

सु्धीजनो !

दिनांक 21 मई 2016 को सम्पन्न हुए "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक - 61 की समस्त प्रविष्टियाँ
संकलित कर ली गयी हैं.



इस बार प्रस्तुतियों के लिए दो छन्दों का चयन किया गया था, वे थे दोहा और कुण्डलिया छन्द.



वैधानिक रूप से अशुद्ध पदों को लाल रंग से तथा अक्षरी (हिज्जे) अथवा व्याकरण के अनुसार अशुद्ध पद को हरे रंग से चिह्नित किया गया है.

यथासम्भव ध्यान रखा गया है कि इस आयोजन के सभी प्रतिभागियों की समस्त रचनाएँ प्रस्तुत हो सकें. फिर भी भूलवश किन्हीं प्रतिभागी की कोई रचना संकलित होने से रह गयी हो, वह अवश्य सूचित करे.

सादर
सौरभ पाण्डेय
संचालक - ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव, ओबीओ
********************************************************
१. आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी
दोहा छंद
=================

पंच तत्व से तन बना, जल उसमें से एक।
दूषित जल या जल बिना, मरते जीव अनेक॥   ................ (संशोधित)


पहुँचा बालक गांव से, दोपहरी का ताप।
तड़प गया पानी बिना, नल भी करे विलाप॥

खाक शहर की छानता, प्यासा औ’ बदहाल।
निकल रही नल से हवा, सूख गये सब ताल॥

भूख प्यास औ’ धूप से, निकल न जाये जान।
होंठों पर भगवान हैं, आँखों में शमशान॥

बिन पानी क्या जिन्दगी, जनता करे पुकार।
पाँच बरस की नींद में, सोई है सरकार॥

भोजन पानी घर नहीं, उस पर जंगल राज।
जो चरित्र से भेड़िये, उनके सिर पर ताज॥

तरण ताल में तैरकर, अफसर नेता मस्त।
साकी बाला साथ में, प्यासी जनता त्रस्त॥

दारू है पर जल नहीं, ना भोजन न मकान।
पदक प्रदूषण में मिला, भारत देश महान॥
***********************
२. आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी
गीत "प्यास"
=====
गला चला है सूख अब,भड़क रही है प्यास
एक बूँद से भी बढ़े,जीवन की फिर आस

पकड़े है नल एक को,कोई बूँद मिल जाय
गर्मी के इस दौर में,थोड़ी प्यास बुझाय
थोड़ी प्यास बुझाय,जान फिर बच ही जाती
एक बूँद भी आज,देख कीमत बतलाती
हैं सब चारों ओर,कमी में जल की अकड़े
पाने जीवन धार,खड़े हैं बर्तन पकड़े।

बूँद-बूँद जल की बचे,आए एक उजास।।

होकर प्यासा ज्ञान का,फिर चल उसकी ओर
गुणीजनों के ओज से,पा ले कोई कोर
पा ले कोई कोर,जरा सा ज्ञानी बन ले
कुछ कर ले तू कर्म,ज्ञान का कुछ तो धन ले
मिटा नहीं तू मान,जान भी अपनी खोकर
मन में धर ले ज्ञान,उसी का प्यासा होकर।

ऐसा करने से बनें,हर जीवन ही ख़ास।।
***********************
३. आदरणीया कान्ता रॉय जी
दोहे छन्द
=======
मृगतृष्णा जीवन तृषा,जीवन है एक आस
जब तक तन में प्राण है,कैसे जाए प्यास

पानी तन की चाहना,पानी जीवन चाह
पानी से ही जीव है,सांस -सांस की राह

सूखी धरती राम की,सूखा हरि का गाँव
पानी कैसे छल रही,चिता बनी है छाँव

गली- गली में लग गयी,हैंडपम्प तस्वीर
बाहर कब तस्वीर से,आयेगी तकदीर

बिसलेरी पानी पियो,परियोजन सरकार
आटा गीला करन को,टैंकर की दरकार

ढूंढत खोजत आज चहुं,बूंद-बूंद को नीर
देखो कैसे दींन का,घटता जाय शरीर

इस छोरे के हाल पर,किसका गया ध्यान
भवसागर में बाप- माँ,रक्षा करें भगवान

जीव-जीव में प्रभु बसे,मानव का है धर्म
छोरे को दो आसरा,कर लो कुछ सत्कर्म
*********************
४. सौरभ पाण्डेय
कुण्डलिया छन्द
==========
सोख रहा हो जब गला, तन प्यासा, मन आह
दोनों सूरत चाहिए, उत्कट अतुलित चाह
उत्कट अतुलित चाह, बूँद में जीवन-धारा
सूखा बम्मा देख, चढ़ा करता है पारा
हे शासन के मुग्ध, तनिक भावों से बरसो
हम ठहरे मज़दूर, कहो मत ’जाओ-तरसो’

हम आवारा-बेहया, कहता जगत कुरूप
इधर हमारा भाग्य भी, मई-जून की धूप
मई-जून की धूप, प्यास को कण्ठ बिठाये
चिलचिल करती खूब, चाँदनी जैसी भाये
झेल रहे हम प्यास, मगर क्या कोई चारा ?
मन-मौजी मनसोख, तभी तो ’हम आवारा’
**************
५. आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी
दोहा-छंद :
=======
दाना-पानी के लिए, मेहनत करे ख़ूब।
सबसे नाते खो दिये, ख़ुदा भर मेहबूब।।

मेहनती यूँ धूप में, प्यासा है बेहाल।
अनाथ का कब कौन है, पूछ सके जो हाल।।

भूखे तन नल पर गया, पीने को दो बूँद।
पानी पापी पी गये, अपनी आँखें मूंद।।

नल पर हक़ तेरा गया, रो कर करे बयान।
टपका कर दो बूंद ये, नल ही देता ज्ञान।।

नीर पीर है तीर सी, ले जाये कब प्राण।
वन, जल रक्षा ही करे, जन-जन का कल्याण।।

[दूसरी प्रस्तुति]
कुण्डलिया-छंद :
==========
घूमी टोंटी ही नहीं, कोशिश थी बेकार।
जंग मिली बूँदें गिरीं, नल पर जो दे मार।।
नल पर जो दे मार, तभी मुट्ठी जल जाती।
बालक की हो हार, प्यास उसको तड़पाती।।
फोटो ले ले यार, दृश्य अद्भुत मासूमी।
प्यासा यह बेजार, नहीं टोंटी ये घूमी।।
********************
६. आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी
दोहा गीत
भरने भूखे पेट को ,आया नल के पास
वो भी है रूठा हुआ ,किस दर जाए प्यास

बाग़ कहीं तर हो रहे ,कहीं नहाती कार
और कहीं पानी बिना ,साँसें जाती हार
अच्छे दिन सबके लिए ,बात लगे परिहास

आती जल की आपदा ,ऐसे ही हर साल
फिर भी क्यों जगते नहीं ,भारी बड़ा सवाल
दोषारोपण छोड़कर ,हो सच का आभास

कुदरत ने दिल खोलकर ,दिया हमें जल कोष
दोहन बिन सोचे किया ,दें किसको अब दोष
सूखी धरती की जुडी ,बस बादल से आस

कुंडलियाँ छंद
यारा नल मुहँ खोल दे ,प्राण रहे हैं सूख
पानी की दो घूँट पी ,सह लेता हूँ भूख
सह लेता हूँ भूख ,सभी घट घर के रीते
रोटी नहीं नसीब ,तुझी पर हम हैं जीते
सूखा हो या बाढ़ ,सभी को मैं क्यों प्यारा
कब तक झेलूँ मार ,बता दे तू ही यारा
***********************
७. आदरणीय टीआर सुकुल जी
दोहा छंद
=======
अब तक जल देता रहा, अब है क्यों वह मौन।
धार टूट क्यों गई है, बतलाये यह कौन ।। 1 ।।

प्यास बहुत ही तेज है , ऊपर से यह धूप।
नल जल देता है नहीं, नहीं यहाॅं है कूप ।। 2 ।।

तड़प युवक की देखकर, नल रोया वहु बार।
बूंद आँसु की गिरी जब, आस हुई तैयार ।।3 ।।

परखत परखत युवक के , नैन हुए आधीर।
आस निरास उदास फिर, ढूड़न लागे नीर ।।4 ।।

व्यर्थ व्यथित इस दशा से, किसका है यह दोष।
करनी का फल भुगत अब, क्यों दिखलाये रोष ।।5 ।।
*******************
८. आदरणीय तस्दीक अहमद खान जी
(१) दोहा छन्द
==========
झूठ समझना मत इसे -सच्चा है यह बोल ।
बेजा नहीं बहाइये - पानी है अनमोल ।

सूख गये हैं सब कुएँ -बारिश की है आस ।
कौन बुझाये अब ख़ुदा -हम लोगों की प्यास ।

बड़े काम की बात है -सुनो लगा कर ध्यान ।
जीवन जल को जान तू -जल को जीवन मान ।

ख़ुश्क हुऐ सारे कुएँ - सूख गए तालाब ।
कैसे आए टैंक से - अपने नल में आब ।

प्यास बुझाए किस तरह - जल टोंटी से दूर ।
बैठा है मुंह खोल के - बेचारा मज़दूर ।

नदी ,कुएं सूखे पड़े - नल भी हैं बेकार ।
जल की खातिर है मचा - जग में हाहाकार । ............... (संशोधित)

चौपाए हों या ज़मीं - या परिन्द ,इंसान ।
पानी इनकी ज़िंदगी - जल है इनकी जान ।

टूट गया पाइप कहीं - कहता है अख़बार ।
पानी आएगा नहीं - अब दो दिन तक यार ।

द्वितीय प्रस्तुति
कुण्डलियाँ छन्द
=========
पानी सबकी ज़िंदगी -- समझो इसका मोल
हर कोई संसार में -- यही रहा है बोल
यही रहा है बोल - हमें है इसे बचाना
बेशक है अनमोल - न बेजा इसे बहाना
कहे यही तस्दीक़ - बनेगी दुनिया फ़ानी
नहीं रहा जिस रोज़ - ज़मीं के अन्दर पानी ।

प्यासा बैठा है मगर - टोंटी पर है हाथ
प्यासे से अब प्यास का - कैसे होगा साथ
कैसे होगा साथ - नहीं है नल में पानी
देख सामने देख - बहुत बेदर्द कहानी
कहे यही तस्दीक़ - दिलाए कौन दिलासा
अपने मुंह को खोल - देख बैठा है प्यासा ।
*******************
९. आदरणीय गोपल नारायन श्रीवास्तव जी
दोहा
=====
बड़ी भयावह ग्रीष्म है, सूखे के आसार
एक बूँद पानी नहीं जग में हाहाकार

सूखे पोखर ताल सब नहीं नीर है लब्ध
छाती धरती की फटी सारा जग स्तब्ध

बढ़ा प्रदूषण नीर का   पंक हुआ बेचैन    (संशॊधित)
संकट में अब प्राण है रंच नहीं है चैन

सभ्य नगर की आपदा  है सर्वथा दुरंत    (संशॊधित)
नल में जल के साथ ही मल आता है हंत


अब ऐसा ढब हो गया खींच रहे नल सांस
एक बूँद लटकी हुयी पडी नाक में फांस

प्राण लिए है कंठ में ऐसी उत्कट प्यास
चातक जैसी टेक है एक बूँद की आस

हमने अरि सा है किया संसृति से व्यवहार
पलटवार उसने किया तृषावंत संसार

मरना तो है एक दिन पर हो सहja प्रयाण
भगवन आकुल प्यास से तजे न कोई प्राण

कुण्डलिया

धरती पर सूखा पड़ा जल का घटा घनत्व
जल जीवन है इसलिए इसका बड़ा महत्व
इसका बड़ा महत्व बचाओ मिलकर पानी
करो सर्वथा बंद प्रकृति से अब मनमानी
सजती अपने आप सृष्टि स्वयमेव संवरती
जब होता अतिचार दरक उठती है धरती
*********************
१०. आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी
कुण्डलिया छंद
==========
रूखा है आनन मगर, नैन रहे हैं बोल |
सचमुच इस संसार में, पानी है अनमोल ||
पानी है अनमोल, इसे मत व्यर्थ गँवाना,
कहता बालक एक, मित्र मत इसे भुलाना,
रहे अगर हम मौन, पडेगा हरदम सूखा,
जीवन होगा ख़त्म, और जग सारा रूखा ||

छोटा है बालक यहाँ, किन्तु बड़ी है प्यास |
सरकारी नल से उसे, सदा रही है आस ||
सदा रही है आस, मिलेगा हरदम पानी,
टपके टप-टप बूँद, नहीं इसमें हैरानी,
होवे जो नल बंद, भाग्य तब होगा खोटा,
मुँह ऊँचा कर मित्र, सोचता बालक छोटा ||
********************
११. आदरणीय समर कबीर साहब
दोहे
===
जल बिन सब लाचार हैं,पशु हो या नर-नार
मेरी सारी बात का,बस इतना है सार

वोट हमारे ले चुके,क्या अब इनको काम
रोटी पानी के लिये मचे भले कुहराम

कब तक झेलेंगे बता, सूखे की ये मार
पाप हमारे भूल जा,कर दे तू उपकार

सब के मन में रोष है,हर सू हाहा कार
कोई करता देखिये,पानी का व्यापार

नलकों में पानी नहीं,सूख गये सब ताल
किसको फ़ुर्सत है "समर",देखे अपना हाल

देखो मारे प्यास के,निकल रही है जान
नल में पानी ढूँढता, बालक है नादान
***********************
१२. आदरणीय प्रदीप कुमार पाण्डेय जी
कुण्डलियाँ छंद
बूँदें गिनती की यहाँ ,टेर रहा मुहँ खोल
वादे थे गिनती परे ,चित्र खोलता पोल
चित्र खोलता पोल ,अश्रु भी सूखे इसके
करते थे बडबोल ,कहाँ वो नेता खिसके
घर में जल भरपूर ,तभी हैं आँखे मूँदें
तब समझेंगे मोल ,मिलें जो गिन गिन बूँदें
*********************
१३. आदरणीय रमेश कुमार चौहान जी
दोहे
===
जल जीवन का सार है, जल बिन जग बेकार ।
जगे कंठ में प्यास जब, समझे है नर नार ।।

बूंद बूंद के मूल्य को, चुका सका है कौन ।
दर दर भटके आदमी, कलकल बैठी मौन ।।

धरा तप्त अभिसप्त है, बंद पड़ी जल धार ।
जल जीवन का सार है, जल बिन जग बेकार ।

कुआँ बावली दर्ज है, खोल देख इतिहास ।
ताल तलैया है जहां, मैल करे उपहास ।।

भू-तल के जल स्रोत सब, लगे आज बीमार ।
जल जीवन का सार है, जल बिन जग बेकार ।

नीर निकासी तुम किये, छेद छेद भू-गर्भ ।
रिक्त हुये भू-गर्भ अब, कहाँ करोगे दर्भ ।।

घड़ा भरे बिन चाहते, नित्य नित्य जल धार ।
जल जीवन का सार है, जल बिन जग बेकार ।

बचा रखें जल स्रोत को, भू-तल पर जल रोक ।
पानी बहे न व्यर्थ में, तभी मिटे यह शोक ।।

बूंद बूंद जब जल बचे, सुखी रहे संसार ।
जल जीवन का सार है, जल बिन जग बेकार ।

द्वितीय प्रस्तुति
कुण्डलिया छन्द
==========
बालक बैठा है थका, नल की टोटी खोल ।
प्यास बुझाते सोचता, जल का क्या है मोल ।
जल का क्या है मोल, जगत यह समझ न पाये ।
नीर मिले बेमोल, व्यर्थ में लोग बहाये ।।
प्यास जगे जब कंठ, मूल्य दे सके न मालक ।
नीर बहुत अनमोल, कहे खुद से वह बालक ।।
****************
१४. आदरणीय रवि शुक्ल जी
कुण्डलिया
=======
प्यासा बालक है बहुत, नल है बिन जल-धार।
मुश्किल कैसी आ गई, करो प्रभो! उपकार।

करो प्रभो! उपकार, कूप-सर सूख रहे हैं।

उस पर लू की मार, सभी जन जूझ रहे हैं।

कहते कवि रवि शुक्ल, धरा का तन-मन प्यासा।

करिये जल प्रभु! दान, न लौटे कोई प्यासा।

पानी का उपयोग हो, कभी न जावे व्यर्थ

जल बिन जीवन है नही, समझो इसका अर्थ

समझो इसका अर्थ बढ़े जीने की हिम्मत

मिले बूँद से बूँद बचा कर टालो किल्लत

हाल हुआ बेहाल, हाय दुख भरी कहानी।

सजल हुए हैं नैन, कभी नल में था पानी
******************
१४. आदरणीय सुधेन्दु ओझा जी
कुण्डलिया
======
प्यास बावरी कर रही, जी को यों हलकान।
निपट, झूरै नलहिं लिपट, जलहिं मनावे प्रान॥
जलहिं मनावे प्रान, कल नहीं आवै जी को।
कल-कल ध्वनि को जल, करै बे-कल सों हिय को॥
कह ओझा कविराय, हार मत, रखियो आस।
बेगहिं धाय,सुरराज, हरैंगे तोहरी प्यास॥

द्वितीय प्रस्तुति 

कुण्डलिया
=======
रोज़ी-रोटी छांड़ि कै, दंड रहे सब पेल।
कैसे उनकी लेखनी, आज बने बेमेल॥
आज बने बे-मेल, मचै जो उनका हल्ला।
गावें उनके गीत, देस और गली मुहल्ला॥
कह ओझा कविराय, लिखो बस खोटी-खोटी।
नल-जल, लो समुझाय, नहीं बस रोज़ी-रोटी॥
***************************
१५. आदरणीया वर्षा चौबे जी
दोहा
====
1 कितना कहा रहीम ने,बिन पानी सब सून |
फिर भी बचा नहीं लिया, अब तरसे दो जून||

2 कल -कल करता नल रूठा, सूखा गला अतराय|
पानी बूँदनहीं कहीं ,अब प्यास कहाँ बुझाय||

3 पानी -पानी जग करे,दीखे कहीं न नीर|
बस आँखन से बह रहा, बनके देखो पीर||

4 सूखे नदी तलाब सब,सूखी तल -तलैया|
बिन पानी बेहाल सब,करत हा हा दैया|

5 पानी संकट जान के,हो जाओ तैयार|
बूँद- बूँद पानी बचे,आओ करें विचार ||

द्वितीय प्रस्तुति

कुण्डलिया छन्द

पनघट सूना देख के ,राधा भईं उदास|
मोहन भी आए नहीं,कोई बुझी न प्यास||
कोई बुझी न प्यास,नैन मेरे अकुलाते|
आ जाओ घनश्याम,व्याकुल तुझे बुलाते||
कह 'वर्षा' बरसो तो, मिटे प्यास जन जनन की|
पूरी हो सब साध,मिलके तुमसे इ जी की||
*********************************
१६. आदरणीय रामबली गुप्ता जी
"कुण्डलिया छंद"

व्याकुल होकर प्यास से, जल की मन ले आस।
दौड़ा-दौड़ा आ गया, बालक नल के पास।।

बालक नल के पास, प्यास ना बुझने पाई।

नल सब सूखे आज, घोर विपदा है आई।।

जल बिन रहा न जाय, बताये किसको रोकर?

समझे जल का मोल, प्यास से व्याकुल होकर।।1।।

जल बिन मन व्याकुल हुआ, धरे नही अब धीर।
सूखे सर-नल-कूप सब, घटा नदी का नीर।।
घटा नदी का नीर, त्रस्त जन-जीवन सारा।
जल अमृत के तुल्य, बिना इसके नर हारा।।
जल-संरक्षण हेतु, यत्न निज कर लो निस दिन।
खूब लगाओ वृक्ष, रहोगे फिर ना जल बिन।।2।।

नल-नहरें सब शुष्क हैं, शुष्क ताल औ कूप।
प्यासे प्राणी त्रस्त हैं, औ तड़पाये धूप।।
औ तड़पाये धूप, आग-सी तपती धरती।
घन क्यों समझें पीर? आह क्यों जनता भरती?
बाग-विटप यदि लगें, जलद बरसायेंगे जल।
करो यत्न इस हेतु, कभी ना सूखेंगे नल ।।3।।
************************
१७. आदरणीय डॉ. पवन मिश्र जी
कुण्डलिया छन्द
===============
आया बालक भागता, लगी तपन की मार।
पहुँचा नल के पास जब, मिली नहीं जलधार।।
मिली नहीं जलधार, यत्न सारे कर डाले।
मिली उसे कुछ बूँद, कहाँ से प्यास बुझा ले  ....  ....   संशोधित
सुनो पवन की बात, नीर बिन चले न काया।
सूखे जल के स्रोत, समय ये कैसा आया।।

तपती जाती ये धरा, बदल रहा भूगोल।
पानी की हर बूँद का, अब तुम समझो मोल।।
अब तुम समझो मोल, सूखती जाये नदिया।
बिन पानी सब क्लान्त, न पुष्पित कोई बगिया।।
कहे पवन ये बात, धरा जो रो रो कहती।
जल संरक्षण लक्ष्य, बचा लो धरती तपती।।
**********************
१८. आदरणीय सुशील सरना जी
दोहा छन्द
===========
नीर हीन धरती हुई, सूख गए सब कूप
प्यासे को पानी नहीं, उसपर बरसे धूप !!१ !!

भानु ताप बरसा रहा , काला हुआ शरीर
लिए कंठ सूखा चला ,नल में मिला न नीर !!!२!

पानी पानी कर रहा, पानी को इंसान
बिन पानी अब देखिये, आफत में है जान !!३!!

जल की महिमा क्या कहें ,बूँद बूँद उल्लास 
बूँद बूँद अनमोल है, बूँद बुझाए प्यास !!४ !!... ... .. .   (संशोधित)

नदी ताल में जल नहीं, बुरा श्वेद से हाल
धरती प्यासी तप रही, तृषित कंठ बेहाल !!५!!
***********************
१९. आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी
दोहा छंद
=======
धरती का यौवन कहे, सूरज है बदमाश
प्यासा बचपन देख के, रोया है आकाश

जल को दीपक मानिए, जिसकी बाती बूँद
अंधकार क्यों बेचता, मानव आँखें मूँद

ठहरा पानी देखकर, मत करना उपहास
नैनों में ठहरी रही, सागर जितनी प्यास

जीवन को सिखला दिया, तूने तो ऐ प्यास
तप्त धरा की गोद में, बूँद बनी विश्वास

वर्षा जल संचय नहीं, स्वार्थ सदा संतोष
कर्म मनुज का बावला, भूजल का क्या दोष?
******************************
२०. आदरणीय पंकज कुमार मिश्र वात्स्यायन जी
दोहे
====
नल सूना पानी बिना, व्याकुल इक इंसान।
कुछ बूँदें टपकें अगर, तो प्रसन्न हो प्रान।।

पानी की हर बूँद तो, होती अमिय समान।
जीवन की गतिशीलता, है पानी से जान।।

जल ही जीवन है सुनो, सभी लगाकर कान।
नदी पोखरे ताल का, रखना होगा ध्यान।।

वसुधा पर जो कुछ यहाँ, बिन पानी है धूल।
यदि जल नहीं बचा सके, होगी भारी भूल।।

जीवन का आधार जो, जीवद्रव्य कहलाय।
जल के बिना बने कहाँ, सच बतलाया जाय।।

माटी से जो भी खनिज,कोई पौधा पाय। ...................  (संशोधित)
जल ही तो है माध्यम, पत्ती तक ले जाय।।

पोषण पाचन की क्रिया, और सभी की साँस।
सब पानी की देन है, पानी के सब दास।।

पंकज पानी के बिना, खिले कौन से ताल।
जल संचय विधियाँ बता,बदल कठिन यह हाल।।.......... (संशोधित) 
************************
२१. आदरणीया वन्दना जी
दोहागीत
=====
आत्ममुग्ध मानव करे प्रकृति से परिहास
खेल रहा नित आग से देकर नाम विकास

बूँद बूँद संघर्ष है हलक जड़ी है फाँस ... ..............(संशोधित)
मजबूरी मजदूर की कर्जदार है साँस
मंगल क्या एकादशी रोज रहे उपवास

प्याऊ लगवाना जहाँ इक पवित्र था काम
बोतल पानी की बिके आज वहाँ अविराम  ............... (संशोधित)
जीवन मूल्य अमोल का नित देखें हम ह्रास

त्रस्त हो रहा प्यास से यह बच्चा बेहाल
गायब हैं इस दृश्य से उनका कौन हवाल
पंछी पौधे मूक पशु सब झेलें संत्रास
***************************
२२. आदरणीया नयना (आरती) कानिटकर जी
दोहा
====
बूंद बूंद अनमोल है, सबके जीवन बोल
जीवन देती हर बूंद,इसका बारिश मोल।१

बूंद बूंद को तरसे हम,नीर करो न बर्बाद
शपथ हमे है खानी, होगा जग आबाद। २

बूंद बूंद पानी नहीं, शोर मचाए जग मे
आज हमे नहना होगा,कलशभर पानी मे।३

बूंद बूंद मे गुंज रही,जलधारा की सांस
तडप तडप के मर जाएंगी,हरपल जीवन आंस।४

पुण्य वही धरा पर है,यह वेदो का ज्ञान
जहाँ रहा जल संरक्षित,जल बिन सब शमशान।५
**************************
२३. आदरणीय लक्ष्मण धामी जी
दोहे
======
तपन भरी इक जेठ में, भटका इत उत बाल।
दिखा न लेकिन एक भी, जीवित पोखर ताल।1।

हुई ताप से खूब जब, बेबस उसकी प्यास।
सूखे नल तक ले गई, एक बूँद की आस।2।

एक हाथ से नल पकड़, बैठा घुटने टेक।
प्यासे अधरों पर गिरी, लेकिन बूँद न एक।3।

लिए तड़प वह प्यास की, बेबस हुआ अधीर।
उभर गई मुख पर निचुड़, तनमन की हर पीर।4।

हलक सूखता जब गया, मन में उठा सवाल।
इतना बदतर क्यों हुआ, इस दुनियाँ का हाल।5।

तभी सोच के पट खुले, मन में आई बात।
हम सबने मिलकर किए, ये बदतर हालात।6।

ताल तलैया बावड़ी, क्या नदिया के तीर।
बदली नगरों ने बहुत, पनघट की तस्वीर।7।

घरघर नल पा गाँव में, लोग हुए मदमस्त।
देखभाल बिन हो गए, ताल-तलैया पस्त।8।

कटे पेड़ तो भमिजल, जा पँहुचा पाताल।
बारिश रूठी खूब तब, सूखा हर इक साल।9।

बिन पानी पड़ने लगी, संकट में पहचान।
जाने अब किस मोड़ पर, चेतेगा इंसान।10।
**********************
२४. आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी
दोहा गीत
========
बच्चे तक प्यारे मरे, नहीं नलों में नीर
कंठ सूखते जा रहे, तपता रहे शारीर |

सतत जहाँ नदिया बहे, फिर क्यों जनता त्रस्त
पानी तक भी बिक रहा, सौदागर सब मस्त |
नहीं रही संवेदना, कोस रहे तकदीर
पीने को पानी नहीं, तपता रहे शारीर |

पञ्च तत्व में है अधिक, जल का ही बाहुल्य
जल बिन फिर कैसे रहे, समझों इसका मूल्य |
भूखा जीवित रह सके, जी न सके बिन नीर
बरसे जब अंगार तो, तपता रहे शारीर |

भू जल भी कम हो रहा, शहर हुए आबाद
हरियाली गायब हुई, रहा न चारा खाद }
उष्म ताप से चुभ रहे, खुश्क कंठ में तीर
ज्वर से पीड़ित जीव का, तपता रहे शारीर |

जहरीला पानी हुआ, पक्षी तक बेचैन,
करे प्रदूषित आदमी, खोता सबकी चैन |
पनप रहे उद्योग सब, नदियों के ही तीर,
धूं धूं करके दिल जले, तपता रहे शारीर |

सृष्टि में ही आ रहा, उष्ण ताप का ज्वार
अगर न चेता आदमी, करे न ईश उपकार
जैसे झेलें आदमी, प्रिय वियोग की पीर,
सूखे रोग अकाल से, तपता रहे शारीर |
*********************
२५. आदरणीय सचिन देव जी
दोहा-छंद
=======
जन-जीवन पर आ पड़ा, संकट ये गंभीर
सूखे सब साधन नहीं, पीने को भी नीर

गिरती बूँद निहारता, बिन पलकों को मूँद
बच जाये जीवन अगर, मिल जाये ये बूँद

व्यथा उजागर कर रहा, बालक ये मजबूर
सुख–सुविधायें छोडिये, पानी से भी दूर

आहत मन क्रंदन करे, आँख बहाती नीर
मेरे प्यारे देश की, ये कैसी तस्वीर

निर्धनता के घाव पर, सूखे की ये मार
कुदरत का भी देखिये, कैसा अत्याचार

सबके लिए विकास का, जो करते गुणगान
मजबूरों की प्यास का, कुछ कर लेते ध्यान
********************

जल की खातिर है मचा 

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Replies to This Discussion

कोई पंक्ति यदि दोषयुक्त रह गयी हो जिसे भूलवश इंगित नहीं किया जा सका है, तो सदस्य अवश्य सूचित करें

शुभ-शुभ

आदरणीय सौरभ जी सादर  प्रणाम, छ्न्दोत्सव  की  कुछ  रचनाएं  शीघ्रता में पढ़ी  थी  अब  इत्मीनान से  एक  ही जगह  पढने  मिली हैं. आपने  कहा और यह  उचित भी  है गलती  सुधारने  का अवसर  मिले. इसलिए  कुछ पंक्तियाँ  जो मुझे  दोष पूर्ण लगी उन्हें यहाँ  लिख रहा हूँ.

 

4 सूखे नदी तलाब सब,सूखी तल -तलैया|
बिन पानी बेहाल सब,करत हा हा दैया|.........आदरणीया वर्षा चौबे जी

 

जल अमृत के तुल्य, बिना इसके नर हारा।।...........आदरणीय रामबली गुप्ता जी

 

माटी से जो भी खनिज, पौध कोई भी पाय
जल ही तो है माध्यम, पत्ती तक ले जाय।।..............१.

पंकज पानी के बिना, कहाँ खिलेगा 'सोच'
जल संचय विधियाँ बता, बदल सभी की सोच।।........२. आदरणीय पंकज कुमार मिश्र जी

 

 

आपका हार्दिक आभार आदरणीय अशोक भाई साहब. मैंने इन उद्धृत पंक्तियों को रंगीन किया था, जैसे भाई पंकज मिश्रा जी की, लेकिन लगता है, कनेक्टिविटी के बार-बार बन्द और चालू होने से ब्राउजर ने उनको सेव नहीं किया है. 

आपने गलत पंक्तियों को स्पष्ट कर अप्रतिम सहयोग दिया है. 

सादर

मुहतरम संचालक महोदय आदाब,मेरा एक दोहा कृपया संकलन में शामिल करने का कष्ट करें:-
"देखो मारे प्यास के,निकल रही है जान
नल में पानी ढूँढता, बालक है नादान"

आदरणीय समर कबीर साहब, आपकेदोहे को अवश्य आपकी प्रस्तुति के साथ जोड़ दिया जायेगा. 

इस बारसंकलन में तनिक विलम्ब हुआ है. वस्तुतः आयोजन के समापन के दूसरे दिन लखनऊ चैप्टर का वार्षिकोत्सव था. जिसमें मैं भी सम्मिलित हुआ था. वहाँ से आते ही दो-तीन आलेख समाप्त करने थे जिन्हें कुछ पत्रिकाओं के लिए प्रेषित करना था. उसके तुरत बाद तरही मुशायरा और फिर लघुकथा गोष्ठी का आयोजन प्रारम्भ हो गया.मैंने सोचा इनके समापन के बाद ही संकलन पोस्ट करना उचित होगा.

वैसे आपकी या आप जैसे गंभीर साहित्यकारों की छन्द प्रयासों के प्रति ललक देखते हुए मन थोड़ा आश्वस्त होता है. अन्यथा दिल यह भी कहता है कि छन्दोत्सव की अप्रासंगिक जैसी बन गयी स्थिति को देखते हुए इसके आयोजन को लेकर दुबारा सोचा जाय. अपने मंच के वर्तमान सदस्य छान्दसिक रचनाओं, या कहिये किसी तरह की कविताई, के प्रति निर्लिप्त-से हैं. कुछ  सदस्य विशिष्ट विधा के प्रति आग्रही हैं. गोया अन्य विधाओं में उन्होंने रचना कर दी तो उनकी अपनी प्रिय विधा में भूचाल आ जायेगा. जबकि, हम जैसों का मानना है कि विधा कोई हो रचनाकार प्रारम्भिक स्तर पर अभ्यासकर्म अवश्य करे. 

सादर

जी दुरुस्त फ़रमाया आपने,में आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ जनाब सौरभ पांडे साहिब ।

आदरणीय सौरभ भाईजी

लगातार व्यस्त रहने के बाद भी सफल आयोजन और संकलन कार्य पूर्ण करने के लिए आपका आभार , और शुभकामनायें।

प्रथम दोहा संशोधन के साथ प्रस्तुत है , प्रतिस्थापित करने की कृपा करें ... सादर

पंच तत्व से तन बना, जल उसमें से एक।
दूषित जल या जल बिना, मरते जीव अनेक॥

आदरणीय छंदोत्सव" अंक - 60 का संकलन कार्य शायद व्यस्तता के कारण अब तक संभव नहीं हो पाया। उन रचनाओं में भी संशोधन की गुंजाइश  है। वैसे भी किसी उत्सव की सभी रचनायें एक जगह संकलित हो तो आयोजकों रचनाकारों और अन्य पाठकों को भी सहूलियत होती है। आपसे अनुरोध है कि समय निकालकर इस कार्य को पूर्ण कर छंदोत्सव 60 को उसके अंतिम पड़ाव तक ले जाने की कृपा अवश्य कीजिए।

सादर

यथा निवेदित तथा संशोधित ..

आदरणीय अखिलेश भाई, आपका कहना बिल्कुल सही है कि अंक साठ का संकलन नहीं हो पाया है. उसका मुख्य कारण यह है कि वह आयोजन का समय ही गलत पड़ गया और अन्य सदस्यों की भागीदारिता छोड़िये मेरी स्वयं की भागीदारिता सही ढंग से नहीं हो पायी. उस आयोजन में एक तरह से कई सक्रिय सदस्य जो छन्दोत्सव के सहभागी सदस्य हुआ करते हैं, भोपाल के ओबीओ वार्षिकोत्सव समारोह के कारण उक्त आयोजन में बने नहीं रह सके और किसी तरह से उस आयोजन का सम्पन्न होना तय हो पाया था. आदरणीय गोपाल नारायण जी जैसे सहयोही सदस्यों के कारण कुछ टिप्प्णियाँ बन पायी थीं. 

इसी कारण आदरणीय, उक्त आयोजन की कुल रचनाओं का संकलन प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं लगा. एक, तो रचनाओं की संख्या बहुत ही कम थी, दूसरे, भोपाल यात्रा से मेरी वापसी करीब हफ़्ते बाद संभ्व हो पायी थी. 

यही कारण है कि अंक इकसठ में ठीक वही छन्द लिये गये जो कि अंक साठ में लिये गये थे. अर्थात दोहा और कुण्डलिया. ताकि जिन सदस्यों को उक्त छन्दों के अभ्यास के क्रम में कुछ चर्चा चाहें तो इस अंक में अपनी बात रख सकें.

सादर आभार

वाह ! संकलन देख कर दिल बाग - बाग हो उठा है । पहली बार दोहे पर हुआ मेरा प्रयास तो बहुत सुखद रहा है । सोलह पदों में सिर्फ पाँच पद गलत हुए है । मै तो वास्तव में पास हो गई । आभार ओबीओ मंच का । जय ओबीओ !

हे हे हे हे..... :-))))))

अपने मने नम्मर चढ़ा के अपने मने पास .. :-)))))

आप उसको दुरुस्तओ कीजिये .. नहीं त रंग-बिरंग ई शोभा नहीं देता है..  

शुभ-शुभ

जी , अवश्य , कोशिश करती हूँ मैै । सादर
आदरणीय सौरभ जी, आपका हृदय तल से आभार। जिस पंक्ति को चिन्हित किया गया है यदि सम्भव हो तो उसे इस प्रकार प्रतिस्थापित किया जाये "मिली उसे कुछ बूँद, कहाँ से प्यास बुझा ले।" सादर

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