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मन की कारिख धोई कै,  प्रेम रंग चटकाय
मोद सरोवर  डूबिए, काम, क्रोध विलगाय

पाप ताप की होलिका जब जारै कोई बुद्ध
प्रकटै तब आह्लाद संग नित्य, मुक्त जो शुद्ध

ज्ञानाग्नि में दहन कर , सभी शुभ अशुभ कर्म
होली हो वैराग्य की, जाने सत का मर्म

मन आ बैठी होलिका, उपजा अति उन्माद
जला दिया जब राक्षसी को, प्रकटा प्रह्लाद

मौलिक एवं अप्रकाशित










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Comment by Usha Awasthi on March 24, 2022 at 12:14pm

आ0 सुरेन्द्र कुमार शुक्ला जी, प्रस्तुति सुन्दर लगने हेतु हार्दिक धन्यवाद।शुभकामनाएँ 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on March 24, 2022 at 11:41am

बहुत सुन्दर होली की प्रस्तुति, हार्दिक शुभकामनाएं

Comment by Usha Awasthi on March 21, 2022 at 1:35pm

आ0 लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी , रचना सुन्दर लगी, जानकर हर्ष हुआ हार्दिक आभार आपका

Comment by Usha Awasthi on March 21, 2022 at 1:30pm

आ0 सुशील सरन जी, प्रस्तुति सुन्दर लगी ,जानकर  खुशी हुई । हार्दिक धन्यवाद आपका

Comment by Sushil Sarna on March 21, 2022 at 1:12pm
वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीया जी हार्दिक बधाई
Comment by Usha Awasthi on March 19, 2022 at 5:27am
  1. आ0 सौरभ पाण्डे जी,आपको भी होली की बहुत शुभकामनाएँ। मैंने इन भावों को किसी विधा को ध्यान में रखकर नहीं लिखा। जो भाव उठे ,  वैसे ही लिख दिया।'अतुकान्त' लिखना भूल गई । प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार आपका।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 18, 2022 at 10:55pm

आदरणीया ऊषा जी, आप दोहा छंद पर अभ्यासरत हों.  प्रस्तुति का ढंग श्लाघनीय है. 

होली की शुभकामनाएँ

शुभातिशुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 17, 2022 at 10:20am

आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन। होली पर सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

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