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मिथिलेश वामनकर's Comments

Comment Wall (95 comments)

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At 11:21pm on October 13, 2019, Nisha said…

बहुत बहुत धन्यवाद.

At 10:01pm on October 10, 2019, धर्मेन्द्र कुमार सिंह said…

बहुत बहुत धन्यवाद मिथिलेश जी

At 11:12pm on March 23, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आदाब
बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ाने का
At 11:45pm on February 23, 2019, dandpani nahak said…
बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी आपका आदेश सर माथे पर
At 3:49am on August 8, 2018, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

भाई जी, नमस्कार!

मेरे अजीज़ मित्र का बेटा आपके भोपाल शहर के IDBI बैंक में  सेवा योगदान किया है। वह पहली बार किसी शहर में अकेले गया है। में भतीजी के शादी में व्यस्त हूं वरना में भी साथ में आता। अब आप भोपाल में ही रहते हैं इसलिए आपको थोड़ा सा कष्ट देना चाहता हूँ।  मेरा फोन नं 9415541353 है। आप अपना फोन नं0 उपलब्ध करा दें तो विस्तार से बात किया जा सके।

आपका मित्र

केवल प्रसाद सत्यम

लखनऊ

At 5:57pm on January 11, 2017, Abhishek kumar singh said…
हार्दिक आभार ओपेन बुक मे शामिल करने के लिए
At 11:10am on December 13, 2016, कुमार मुकुल said…
भाई मिथिलेश जी, बहुत बहुत धन्‍यवाद।
At 6:46pm on September 7, 2016, Arun Arnaw Khare said…

आप सभी का कोटिशः धन्यवाद... आपने मुझे ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में शामिल कर लिया...

At 3:16pm on September 1, 2016, आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' said…

मिथिलेश जी...सर्वप्रथम तो आप सभी का कोटिशः धन्यवाद... आपने मुझे ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में शामिल कर लिया...
मैं इस पर आभार व्यक्त करता हूँ आपका...मैंने मात्रिक गणना आदि कुछ लेख पड़े जो की काफ़ी फायदेमंद है हम सभी के लिए..इस समूह को बनाने एवं इसके सफल संचन हेतु आप बधाई के पात्र हैं.. मैं भी अपनी रचनाएं यहाँ पोस्ट कर अग्रजों का, गुरुजनों का आशीष एवं उनका मार्गदर्शन पाता रहूँ.. यही आशा करता हूँ ...
आपका दिन मंगलमय हो!!!

At 6:19pm on August 30, 2016, Gurpreet Singh jammu said…
जी बहूत बहुत धन्यवाद मिथिलेश ji
At 10:27am on August 29, 2016, Gurpreet Singh jammu said…
आदरणीय मिथिलेश जी. मैं obo का नया सदस्य हूँ.क्या मैं इस मंच पर अपनी तरफ़ से कोइ चर्चा शुरू कर सकता हूँ.जिस में कि मैं गज़ल के बारे में अपने प्रश्न पूछ सकूं और जो सदस्य जवाब देना चाहे वहाँ दें सके. अगर हाँ तो कैसे? या ऐसा ही कुछ और हो सके. Mehrbaani
At 8:07am on August 23, 2016, डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा said…

आदरणीय मिथिलेशजी,

सादर वन्दे. क्षमा करें, मैं अंतरजाल और OBO पर नियमित नहीं हूँ और न ही तकनिकी रूप से कुशल हूँ, सीख रहा हूँ. आपकी सद्भावनाओं पर आज दृष्टि पड़ी, आभार व्यक्त न कर पाने का अपराधी और क्षमा प्रार्थी हूँ. वैसे मैंने कभी अपना जन्म दिन मनाया नहीं, क्यूंकि ऐसी ख़ुशी और ग़म मैंने नहीं पाले. आजकल के ये सामान्य शिष्टाचार हैं, मैं इनमे अनाड़ी हूँ पर आपकी शुभकामनाओं हेतु आभार व्यक्त करता हूँ- बहुत विलम्ब हो गया है. कई प्रशंसकों को भी उत्तर नहीं दे पाता...अन्यथा लेते होंगे..मनसा सबको आभार व्यक्त करता हूँ. पुनश्च आभार.

At 8:35pm on August 14, 2016, अलका 'कृष्णांशी' said…

आदरणीय मिथिलेश वामनकर सर जी,ओ.बी.ओ. परिवार का सदस्य बनने का जो गौरव आप ने मुझे दिया उसके लिये दिल से आभार ,अभी सीखना शुरू किया है हमने, आपके निर्देशन में शायद हम भी कुछ अच्छा लिखना सीख जायें। 

At 4:52pm on July 7, 2016, Dr.Rupendra Kumar Kavi said…

namaskar

At 7:41pm on June 9, 2016, SudhenduOjha said…

आदरणीय मिथिलेश जी,

कह के तो नहीं गया था,

-पर सामान रह गया था

 

समय का ऐसा सैलाब,

-वजूद भी बह गया था

क्या आए हो सोच कर,

-हर चेहरा कह गया था

बाद रोने के यों सोचा,

-घात कई सह गया था

गिरा, मंज़िल से पहले,

-निशाना लह गया होगा

पुरजोर कोशिश में थी हवा,

-मकां ढह गया होगा

तुम आए, खैरमकदम!

-वरक मेरा दह गया होगा?

सादर,

 

मौलिक है, अप्रकाशित भी

सुधेन्दु ओझा

At 8:47am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

उपयोगी जानकारी देने हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार आपका आ.आदरणीय मिथिलेश वामनकर सर जी,अभी यहाँ की जानकारी  पूरी नहीं है,तो आपको जवाब देने में देर हो गई पुनः आभार आपका .

At 9:12am on May 20, 2016, Abha saxena Doonwi said…

शुक्रिया  मिथिलेश वामनकर जी ...:)

At 9:15pm on May 7, 2016, Sushil Sarna said…

Resp.Sir I have received the poem through Resp.Er.Ganesh jee,s mail.Thanks for ur kind cooperation.

At 7:51pm on May 3, 2016, Sushil Sarna said…

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी , नमस्कार  ... सर 66 वें लाइव समारोह में मैंने आपको प्रदत्त विषय पर एक अतुकांत रचना उत्सव में सम्मिलित करने हेतु अनुरोध किया था क्योँकि उस दौरान मैं दिल्ली गया हुआ था लेकिन भोपाल उत्सव के कारण वो सम्मिलित न हो सकी। आपसे अनुरोध है कि यदि वो रचना आपके मैसेज बॉक्स में सुरक्षित हो तो कृपया उसे सामान्य पोस्ट के अंतर्गत सम्मिलित करवा दें या मुझे मैसेज बॉक्स में प्रेषित कर दें ताकि मैं उसे पटल पर ला सकूं। आपसे सहयोग का अनुरोध है। धन्यवाद। 

At 9:44pm on April 21, 2016, Dr. Ehsan Azmi said…
मक़बरा का वज़्न है 212/211

कृपया ध्यान दे...

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