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एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल

अरकान:-12112 12112

न छाँव कहीं,न कोई शजर

बहुत है कठिन,वफ़ा की डगर

अजीब रहा, नसीब मेरा

रुका न कभी,ग़मों का सफ़र

तलाश किया, जहाँ में बहुत

कहीं न मिला, वफ़ा का गुहर

तमाम हुआ, फ़सान: मेरा

अँधेरा छटा, हुई जो सहर

ग़मों के सभी, असीर यहाँ

किसी को नहीं, किसी की ख़बर

बहुत ये हमें, मलाल रहा

न सीख सके, ग़ज़ल का हुनर

हबीब अगर, क़रीब न हो

अज़ाब लगे, हयात "समर"

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on July 6, 2019 at 9:24am

आदरणीय समर साहब, वाफ़िर अरबी में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने  वाली बह्रों में से एक है लेकिन उर्दू के मिज़ाज के अनुरूप न होने की वजह से उर्दू के क्लासिकल दौर के किसी शायर ने इसका इस्तेमाल नहीं किया.
इस अड़ियल घोड़े जैसी बह्र को अच्छी तरह साधने के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 6, 2019 at 12:15am

आदरणीय बाऊजी प्रणाम

क्या कहने........ग़ज़ल का एक और प्रतिमान पेश किया है आपने... सीखने के लिए बेहतर उदाहरण


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Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2019 at 12:20pm

कठिन बहर पर बढिया ग़ज़ल कही आदरणीय ! हार्दिक बधाई

Comment by Dayaram Methani on July 4, 2019 at 9:41pm

आदरणीय समर कबीर जी, बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2019 at 7:27pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन गजल हुई है हार्दिक बधाई । एक नई बह्र से परिचित कराने के लिए आभार।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 4, 2019 at 5:53pm

samar ji pranam, bahut khub huzur

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