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नफरत को लोग शान से सर पर बिठा रहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२१/२१२१/१२२/१२१२

जब से वफा जहाँन में मेरी छली गयी

आँखों में डूबने की वो आदत चली गयी।१।

नफरत को लोग शान से सर पर बिठा रहे

हर बार मुँह पे प्यार के कालिख मली गयी।२।

अब है चमन ये  राख  तो करते मलाल क्यों

जब हम कहा करे थे तो सुध क्यों न ली गयी।३।

रातों  के  दीप  भोर  को  देते  सभी  बुझा

देखी जो गत भलाई की आदत भली गयी।४।

माली को सिर्फ  शूल  से  सुनते दुलार ढब

जिससे चमन से रुठ के हर एक कली गयी५।

रूहों से बढ़ के मोल है दुनिया में रूप का

चीनी के दौर में  कहाँ  गुड़  की डली गयी।६।

*****

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2019 at 4:44am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन । गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on February 7, 2019 at 9:55pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सादर नमस्कार, वाह लाजबाव ग़ज़ल हुई , बधाई स्वीकारें
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2019 at 10:38pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 5, 2019 at 6:01pm

आद0 लक्ष्मण जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 5, 2019 at 5:46am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभार ।

भूलबस अरकान गलत लिख गये । सही अरकान इस प्रकार हैं

२२१/२१२१/२२२/१२१२

Comment by Samar kabeer on February 4, 2019 at 9:32pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

अरकान चेक कर लें ।

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