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पुरखे हमारे  एक  हैं  मजहब  से तोल मत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' ( गजल )

२२१/२१२१/२२२/१२१२


क्या कीजिएगा आप यूँ पत्थर उछाल कर
आये हैं भेड़िये तो  सब  गैंडे सी खाल कर।१।


कितने  जहीन  आज-कल  नेता  हमारे  हैं
मिलके चला रहे हैं सब सन्सद बवाल कर।२।


वो चुप थे बम के दौर में ये चुप हैं गाय के
जीता न कोई  देश  का  यारो खयाल कर।३।


पुरखे हमारे  एक  हैं  मजहब  से तोल मत
तहजीब जैसी कर रहे उस पर मलाल कर ।४।


माना की मिल गयी तुझे संगत वजीर की
प्यादा है उसके जैसे अब टेढ़ी न चाल कर।५।


निकलेगा हल तो बात का ठंडे दिमाग से
क्या होगा ऐसे खून को यारो उबाल कर।६।


उसमें जो  बातें  प्यार  की  पढ़ता नहीं कोई
भाई से भाई लड़ रहा मजहब को ढाल कर।७।


माना कि बीज बो रहे नेता ही इसका नित
दंगों के सिलसिले पे तू खुद से सवाल कर।८।


मौलिक अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2019 at 2:47pm

आ. भाई दिगम्बर जी, सादर अभिवादन । गजल में पिरोये विचारों के अनुमोदन करने का आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2019 at 2:42pm

आ. भाई समर जी, सादर आभार ।

Comment by दिगंबर नासवा on February 8, 2019 at 1:23pm

लाजवाब सोच को शब्दों में बाँधने का प्रयास है आपकी गज़ल लक्षमण जी ... 

मौलिक सोच ... शिल्प पे आदरणीय समर कबीर जी की बातें सभी मिल के सीख रहे हैं ... 

Comment by Samar kabeer on February 7, 2019 at 2:44pm

जी,अब ठीक है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2019 at 11:01pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2019 at 10:59pm

आ. भाई आसिफ जैदी जी, उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2019 at 10:57pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।
'आये हैं भेड़िये तो  सब  गैंडे सी खाल कर'
भी व्याकरणिक रूप से शुद्ध ही है । क्योंकि इसका भाव 'गैंडे की खाल में' से भिन्न है । यहाँ वे खाल ओढ़कर नहीं आये हैं बल्कि खाल उसकी तरह मजबूत करके आये हैं ।
'तहजीब जैसी हो रही उस का मलाल कर'
इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर व शिल्प दोष दूर कर दिया है।
'भाई से भाई लड़ रहा मजहब की ढाल कर'
में क्या अब -व्याकरण दोष दूर हो गया है ?
'प्यादा है उसके जैसे तू टेढ़ी न चाल कर'
क्या इस मिसरे में शिल्प अब ठीक है। मार्गदर्शन कीजिए।

Comment by नाथ सोनांचली on February 5, 2019 at 5:38pm

आद0 लक्ष्मण जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल का बढिया प्रयास हुआ है,बधाई लीजिये। आद0 समर साहब की बातों का संज्ञान लीजियेगा। सादर

Comment by Asif zaidi on February 5, 2019 at 5:06pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी बहुत ख़ूबसूरत कोशिश की बधाई 

Comment by Samar kabeer on February 5, 2019 at 4:33pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'आये हैं भेड़िये तो  सब  गैंडे सी खाल कर'

शुद्ध व्याकरण है 'गैंडे की खाल में'।

'वो चुप थे बम के दौर में ये चुप हैं गाय के
जीता न कोई  देश  का  यारो खयाल कर'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं,शिल्प दोष भी है ।

'तहजीब जैसी कर रहे उस पर मलाल कर'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर भी है,शिल्प दोष भी है ।

'प्यादा है उसके जैसे अब टेढ़ी न चाल कर'

इस मिसरे में भी शिल्प कमज़ोर है ।

'भाई से भाई लड़ रहा मजहब को ढाल कर'

'मज़हब को ढाल कर'--व्याकरण दोष ।

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