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एक ग़ज़ल इस्लाह के लिए

221    2121     1221     212

माबूद कह दिया कभी मनहूस कह दिया
उसकी निगाहों ने सदा तस्लीम ही कहा

मुझको ये कैसा दिल दिया तूने मेरे खुदा
जिसको खुशी और गम का सलीका नहीं पता

ओझल नजर से हो गई तस्वीर आपकी
बस इतना होने के लिए क्या-क्या नहीं हुआ

जीवन के सारे हादसे आंखो में आ गए
मुरझा के एक फूल जो मिट्टी में जा गिरा

आया है अब की बार इक दूजे ही रंग में
तन्हाइयों से दर्द का रिश्ता नया था

अहसास ज़िन्दगी मेरी भटकी क्यों इस तरह
जैसे कि माँ से मेले में बच्चा बिछड़ गया

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by मनोज अहसास on January 24, 2019 at 9:49am

आदरणीय समर कबीर साहब बहुत बहुत आभार

इस मिसरे में टाइप करते समय न छूट गया 

आदरणीय सुर्खाब बशर और आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी हार्दिक आभार सादर

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 12, 2018 at 4:52pm

भाई मनोज जी उम्दा रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Surkhab Bashar on December 7, 2018 at 9:36pm

जनाब मनोज कुमार  जी उम्दा ग़ज़ल पढ़ने  को मिली 

बहुत बहुत  मुबारक बाद

Comment by Samar kabeer on December 7, 2018 at 8:39pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'  तन्हाइयों से दर्द का रिश्ता नया था'

ये मिसरा लय में नहीं है,देखियेगा ।

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