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रंगहीन ख़ुतूत ...

तन्हाई
रात की दहलीज़ पर
देर तक रुकी रही
चाँद
दस्तक देता रहा
मन
उलझा रहा
किसका दामन थामूँ
अर्श के माहताब का
पलकों के ख्वाब का
या ज़ह्न के सैलाब का
सवाल
गर्म लावे से
उबलते रहे
जवाब
तन्हाई में
सुबकते रहे
मैं ज़ीना-ज़ीना
ज़ह्न के सन्नाटों में
उतरती रही
अपनी ही साये में
बिखरती रही
बस रहे गए हाथ में
अर्थहीन अलफ़ाज़ के
रंगहीन ख़ुतूत के

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on December 17, 2018 at 6:11pm

आदरणीय समर कबीर साहिब आदाब , प्रस्तुति को आत्मीय मान देने एवं सुधारात्मक सुझाव देने का दिल से शुक्रिया। मैं अभी एडिट करता हूँ सर। शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2018 at 6:07pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2018 at 6:06pm

आदरणीय  narendrasinh chauhanजी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on December 17, 2018 at 6:06pm

आदरणीय फूल सिंह जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2018 at 8:02pm

आ. भाई सुशील जी, सुंदर कविता हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on December 11, 2018 at 10:17pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'  मैं जीना जीना'--"ज़ीना ज़ीना" !

'लफ़्ज़ों से लबरेज़'

'लफ़्ज़' शब्द का बहुवचन "अल्फ़ाज़" है,देखियेगा । 

Comment by narendrasinh chauhan on December 11, 2018 at 3:19pm

लाजवाब , खूब सुन्दर रचना सर 

Comment by PHOOL SINGH on December 11, 2018 at 2:13pm

क्या बात है सर जी बहुत सूंदर

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