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बन के सूरज सा जमाने में निकलते रहिये-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

बन के' सूरज सा' जमाने में' निकलते रहिये
हर अँधेरे को' उजाले मे' बदलते रहिये

जिंदगी एक सफर खुशियों' भरा हो अपना
यूँ ही बस आप मेरे साथ तो चलते रहिये

दिल के' मन्दिर में उजाले की' वज़ह आप ही हैं
अब तो इस दिल में' सदा दीप सा' जलते रहिये

मैं जो' हूँ साथ जमाने से' भला डर कैसा
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिये

मेरे' हर गीत-ग़ज़ल-नज़्म-तरानों में' यूँ ही
बन के' नित शब्द नये प्यार के ढलते रहिये

दिल की बगिया में बहारों के सुमन मुस्काएँ
इसमें बस आप सुबह शाम टहलते रहिये

लूटते चैनो-अमन जो भी वतन का साहिब!
ऐसे' साँपो के' उठे फन को' कुचलते रहिये

रचना-रामबली गुप्ता

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 990

Comment

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Comment by Ajay Tiwari on September 19, 2018 at 4:15pm

आदरणीय रामबली जी, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.  

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 12:51pm

आ. भाई रामबली जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधायी ।

Comment by Samar kabeer on September 18, 2018 at 12:30pm

आपसे टेलीफोन पर बात करने के बाद अब ये शैर यूँ कर सकते हैं:-

"ज़िन्दगी का ये सफ़र ख़ुशियों से भर जायेगा

मेरे हमराह रह-ए-इश्क़ पे चलते रहिये "

Comment by Samar kabeer on September 18, 2018 at 11:26am

'जिंदगी एक सफर खुशियों' भरा हो अपना
यूँ ही बस आप मेरे साथ तो चलते रहिये'

इस शैर को यूँ कर सकते हैं:-

'ज़िन्दगी का ये सफ़र ख़ुशियों भरा हो अपना

यूँ ही बस आप मेरे साथ में चलते रहिये'

'मैं जो' हूँ साथ जमाने से' भला डर कैसा'

इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'साथ हूँ मैं तो ज़माने का भला डर कैसा'

'इसमें बस आप सुबह शाम टहलते रहिये'

इस मिसरे में सहीह शब्द है "सुब्ह",इसे यूँ कर सकते हैं :-

'सुब्ह से शाम तलक आप टहलते रहिये'

'लूटते चैनो-अमन जो भी वतन का साहिब!
ऐसे' साँपो के' उठे फन को' कुचलते रहिये'

इस शैर के ऊला मिसरे में सहीह शब्द "अम्न" है, इसे यूँ कर सकते हैं:-

'लूटते अम्न वतन का जो हमेशा साहिब'

और सानी मिसरे में 'साँपो' को "साँपों" कर लें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 18, 2018 at 9:01am

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय...

Comment by रामबली गुप्ता on September 17, 2018 at 1:03pm

सादर प्रणाम आदरणीय समर भाई साहब। कौन-कौन से मिसरे कमजोर हैं थोड़ा इंगित करें और संशोधन के लिए सुझाव दें। बेहतर की हमेशा गुंजाइश है। मैं आपके कहे अनुसार प्रयास करूँगा।सादर

Comment by रामबली गुप्ता on September 17, 2018 at 12:59pm

सादर आभार आदरणीय भाई बसंत कुमार जी 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 17, 2018 at 9:36am

आदरणीय रामबली गुप्ता जी, शुभ प्रभात,  बहुत खूब गजल कही आपने 

Comment by Samar kabeer on September 16, 2018 at 6:10pm

जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

कुछ मिसरों पर थोड़ा और समय देते तो ग़ज़ल और निखर जाती ।

Comment by रामबली गुप्ता on September 15, 2018 at 5:57pm

हृदय से आभार आदरणीय मित्र सुरेन्द्रनाथ सिंह जी

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