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श्री अटल-मृत्यु संवाद:- कविता

कहा मौत ने श्री अटल से, वक़्त गया जाने का,

स्वर्ग से आदेश मुझे है, आपको वहाँ लिवाने का।

पर साधारण नर नहीं ,वह युगपुरूष की काया थी,

गर है जीवन माया तो, वह एक उत्तम माया थी,

थे कलयुग के भीष्म सरीखे दृढ़, अटल-विश्वासी ,

जिनको पाकर धन्य हुए थे, हम सब भारतवासी

हुआ दूसरी बार युगों में, पुनः अलौकिक तथ्य घटित,

किया प्रतीक्षा नर-काया की स्वर्ग-यान वह रत्नजड़ित,

बोले अटल, अटल मृत्यु से, एक दिवस तो रुकना होगा,

आज स्वर्ग के नियमों को धरती के आगे झुकना होगा।

क्योंकि है स्वाधीन दिवस, है राष्ट्र ख़ुशी से मतवाला,

इसे भिगो कर अश्रु-लहर से, मैं आज नहीं जानेवाला ,

आज नहीं यह हो सकता कि झुक जाए तिरंगा प्यारा,

विजयपर्व के गर्व दिवस पर शोकग्रस्त हो देश हमारा।

फिर मृत्यु को दिखा दुबारा भीष्म पितामह का सा दर्प,

एक दिवस तक हाथ जोड़ कर खड़ा रहा वह काल-सर्प,

अंततः स्वाधीनता पर घर-घर तिरंगा फहर गया,

युगपुरूष के सामने कल-चक्र भी ठहर गया।

16-अगस्त को स्वर्ग-धाम को चल पड़ी उनकी सवारी,

मृत्यु भी जिसकी करे ग़ुलामी, वह थे अटल विहारी|

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on August 18, 2018 at 12:13pm

जनाब मोहित मिश्रा जी आदाब,अच्छी कविता हुई,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 18, 2018 at 11:07am

श्रद्धांजलि स्वरूप समसामयिक बढ़िया सृजन। इस मंच के काव्य-विधा/छंद संबंधित आलेख व आयोजनों के अध्ययन कर आप इसे बढ़िया छंदबद्ध भी कर सकते हैं। हार्दिक बधाइयां आदरणीय  मोहित मिश्र 'मुक्त' साहिब।

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