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इक आवारा तितली सी मैं
उड़ती फिरती थी सड़कों पे...

दौड़ा करती थी राहों पे
इक चंचल हिरनी के जैसे ...

इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ
बेपरवाह घूमा करती थी...

कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के
पत्ते चूमा करती थी...

चलते चलते यूँ ही लब पर
जो गीत मधुर आ जाता था...

बदरंग हवाओं में जैसे
सुख का मंजर छा जाता था...

बीते पल की यादों से फिर
मैं मन ही मन भरमाती थी...

इठलाती थी बलखाती थी
लहराती फिर सकुचाती थी...

हैं आज कदम कुछ ठहरे से
गुमसुम से सहमे सहमे से...

डर डर के बढते हैं ऐसे
जैसे निकले हों पहरे से...

ना गीत जुुुबा पर है कोई
ना जाम हैं शोखनिगहों के...

बस इक टक देखा करती हूँ
कंकड पत्थर इनराहों के...

हैं कदम बड़े डगमग डगमग
यूँ संभल संभल के चलते हैं...

इन ऊँची नीची राहों पर
आगे बढने से डरते हैं...

चलते चलते रूक जाती हूँ
ना जाने क्या हो जाता है...

अधरों पे हँसी लिए ये मन
अंदर अंदर घबराता है...

सबको तो बहुत लुभाती हैं
पर मुझे सताती हैं हर पल...

पांवों में बेड़ी लगती हैं
ये ऊँची एड़ी कीं चप्पल..... !!


( मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Rakshita Singh on June 26, 2018 at 8:20pm

आदरणीय महेन्द्र जी नमस्कार,

कविता पर आपकी उपस्थिति व सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ...लिखना सार्थक हुआ !!

Comment by Rakshita Singh on June 26, 2018 at 8:18pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी नमस्कार , बहुत-बहुत धन्यवाद ।।

Comment by Rakshita Singh on June 26, 2018 at 8:17pm

आदरणीय सुशील जी नमस्कार 

आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।।

Comment by Rakshita Singh on June 26, 2018 at 8:04pm

आदरणीय कबीर जी नमस्कार आपकी शिर्कत , हौसला अफजाई  व मार्गदर्शन  के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया...

Comment by Rakshita Singh on June 26, 2018 at 8:01pm

आदरणीया प्रतिभा जी नमस्कार,
बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by Mahendra Kumar on June 26, 2018 at 10:09am

//पांवों में बेड़ी लगती हैं
ये ऊँची एड़ी कीं चप्पल..... !!// इन दो पंक्तियों में आपने बहुत कुछ कह दिया है आदरणीया रक्षिता जी। बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर। 

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on June 25, 2018 at 7:39pm

आद0 रक्षिता जी सादर अभिवादन। बढ़िया सृजन। लययुक्त । बहुत बहुत बधाई देता हूँ इस सृजन पर।सादर

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2018 at 2:55pm

वाह आदरणीया रक्षिता सिंह जी सृजन में अंतर्मन की व्यथा का मोहक चित्रण हुआ है। इस प्रवाहमयी प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on June 25, 2018 at 11:11am

मुहतरमा रक्षिता सिंह जी आदाब,बहुत सुंदर रचना है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

चौथी पंक्ति में 'जैसे' को " जैसी"करना उचित होगा ।

एक दो जगह टंकण त्रुटियाँ देख लें ।

Comment by pratibha pande on June 23, 2018 at 8:23am

बहुत खूब, बढ़िया प्रस्तुति रक्षिता जी बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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