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गजल- फिर कोई मीठी शरारत हो गई है

मापनी - 2122 2122 2122

 

आपसे इतनी मुहब्बत हो गई है

लोग कहते हैं कि आफत हो गई है

 

नींद मेरी हो न पायी थी मुकम्मल

फिर कोई मीठी शरारत हो गई है

 

ढूँढता है रोज मिलने का बहाना

आपकी इस दिल को’ आदत हो गई है

 

शुक्रिया जो आप मेरे घर पधारे    

रौशनी में और बर्कत हो गई है

 

सख्त पहरे हो गए राहों में जब से 

और भी मजबूत चाहत हो गई है

 

दिल को देकर दर्द ही पाया है लेकिन 

जिन्दगी अब खूबसूरत हो गई है

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 3:25pm

दिल से शुक्रिया आदरणीय gumnaam pithoragarhi  जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 3:24pm

दिल से शुक्रिया आदरणीय TEJ VEER SINGH  जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 3:24pm

दिल से शुक्रिया आदरणीया Neelam Upadhyaya जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 3:24pm

दिल से शुक्रिया आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपका 

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 13, 2018 at 12:30pm

वाह क्या खूब ग़ज़ल कही है वाह.......

Comment by TEJ VEER SINGH on June 13, 2018 at 12:09pm

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी। बेहतरीन गज़ल।

सामना जब से किया है मुश्किलों का

और भी मजबूत चाहत हो गई है

Comment by Neelam Upadhyaya on June 13, 2018 at 11:56am

"ढूँढता हर रोज मिलने का बहाना

आपकी इस दिल को’ आदत हो गई है"

बहुत ही सुंदर गजल के  लिए मुबारकबाद आदरणीय बसंत कुमार जी ।

Comment by Shyam Narain Verma on June 13, 2018 at 11:03am
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल! आपको बहुत-बहुत बधाई! सादर 
Comment by बसंत कुमार शर्मा on June 13, 2018 at 8:34am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी ह्रदय से आभार आपका 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2018 at 6:58am

दिल लिया है या दिया है कुछ भी कहिये

जिन्दगी अब खूबसूरत हो गई है

बहुत खूब.....कोटि कोटि बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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