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क्षणिकाएं ....

१.
खेल रही थी
सूर्य रश्मियाँ
घास पर गिरी
ओस की बूंदों से
वो क्या जानें
ये ओस तो
आंसू हैं
वियोगी
चाँद के

....................

२.

जीवन
मिटने के बाद भी
ज़िंदा रहता है
स्मृति के गर्भ में
अवशेष बन
श्वासों का

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 24, 2018 at 4:04pm

आद0  Neelam Upadhyayaजी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 23, 2018 at 10:41am

आदरणीय सुशिल सरना जी।  बढ़िया क्षणिकाओं की प्रस्तुति।  बधाई  स्वीकार करें। 

Comment by Sushil Sarna on April 21, 2018 at 8:36pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन के भावों को आत्मीय सम्मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna on April 21, 2018 at 8:36pm


आदरणीय हर्ष महाजन जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया का आभारी है।

Comment by Samar kabeer on April 21, 2018 at 10:40am

जनाब सुशील सरना जी आदाब,दोनों क्षणिकाएं बहुत उम्दा हुई हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Harash Mahajan on April 20, 2018 at 6:37pm

वाह आदरणीय सुशील साहब ।

सुंदर चित्रण आपकी क्षणिकाओं में ।

अच्छी ओरस्तुयी के लिए बधाई ।

सादर ।

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