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2122-1122-1122-22

टूटकर ख्वाब ज़माने में बिखर जाते हैं ।
आज़माने में बहुत लोग मुकर जाते है ।।

वो जलाता ही रहा हमको बड़ी शिद्दत से ।
हम तो सोने की तरह और निखर जाते हैं ।।

हुस्न वालों के गुनाहों पे न पर्दा डालो ।
क्यूँ भले लोग यहां इश्क से डर जाते हैं ।।

मुन्तजिर दिल है यहां एक शिकायत लेकर ।
आप चुप चाप गली से जो गुज़र जाते हैं ।।

कुछ उड़ानों की तमन्ना को लिए था जिन्दा ।
क्या हुआ आपको जो पर को कतर जाते हैं ।।

मत बयां कीजिये अपने भी सितम के किस्से ।
दर्द बनकर वो यहां दिल में ठहर जाते हैं ।।

इस मुहब्बत पे है इल्जाम का साया मुमकिन ।
वो सरे आम निगाहों से उतर जाते हैं ।।

उसके आने की खबर जब भी हुई महफ़िल को ।
आहटे हुस्न से कुछ लोग सवंर जाते हैं ।।

क्यूँ छुपाते हैं मियाँ आप मुहब्बत अपनी ।
सबको मालूम है अब आप किधर जाते हैं ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on April 16, 2018 at 11:38pm

आ0 सुशील शरण साहब तहे दिलसे शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on April 16, 2018 at 8:35pm

उसके आने की खबर जब भी हुई महफ़िल को ।
आहटे हुस्न से कुछ लोग सवंर जाते हैं ।।
बहुत खूब ... आदरणीय इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिल से मुबारक कबूल फरमाएं।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 16, 2018 at 8:30pm

आ0 श्याम नारायण वर्मा साहब बहुत बहुत आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 16, 2018 at 8:29pm

आ0 कल्पना भट्ट रौनक जी हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on April 16, 2018 at 8:28pm

आ0 तेज वीर सिंह साहब तहे दिल शुक्रिया ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 16, 2018 at 7:01pm

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन मणि जी। बेहतरीन गज़ल।

क्यूँ छुपाते हैं मियाँ आप मुहब्बत अपनी ।
सबको मालूम है अब आप किधर जाते हैं ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 16, 2018 at 3:41pm

कुछ उड़ानों की तमन्ना को लिए था जिन्दा ।
क्या हुआ आपको जो पर को कतर जाते हैं ।।

मत बयां कीजिये अपने भी सितम के किस्से ।
दर्द बनकर वो यहां दिल में ठहर जाते हैं ।।

इस मुहब्बत पे है इल्जाम का साया मुमकिन ।
वो सरे आम निगाहों से उतर जाते हैं ।।

बहुत खूब| हार्दिक बधाई आदरणीय|

Comment by Shyam Narain Verma on April 16, 2018 at 1:38pm
इस लाजवाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई 

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