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बेबस पे और जुल्म न ढाने की बात कर।
गर हो सके तो होश में आने की बात कर ।।

.

क्या ढूढ़ता है अब तलक उजड़े दयार में ।
बेघर हुए हैं लोग बसाने की बात कर ।।

.

खुदगर्ज हो गया है यहां आदमी बहुत ।
दिल से कभी तो हाथ मिलाने की बात कर ।।

.

मुश्किल से दिल मिले हैं बड़ी मिन्नतों के बाद ।
जब हो गया है प्यार निभाने की बात कर ।।

.

यूँ ही बहक गये थे कदम बे इरादतन ।
इल्जाम मेरे सर से हटाने की बात कर ।।

.

मैंने भी आज देख ली दरिया दिली तेरी ।
अब तो न और पीने पिलाने की बात कर ।।

.

मुद्दत से हँस रहा मेरी मजबूरियों पे तू ।
हैं गम भी बेसुमार बटाने की बात कर ।।

.

गिरता रहे क्यों बारहा नजरों से कोई शख्स ।
शिकवे शिकायतों को मिटाने की बात कर ।।

क्यूँ  रट लगाये  बैठा  है बस  एक बात पर ।
कुछ तो कभी कभार ज़माने की बात कर ।।

        ---नवीन मणि त्रिपाठी
          मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Naveen Mani Tripathi on May 1, 2018 at 10:19am

आ0 नीलेश जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 1, 2018 at 10:18am

आ0 कबीर सर सादर नमन 

अत्यंत व्यस्तता की वजह से हाजिर नहीं हो पाया था इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ   । 

       शीघ्र ही सक्रियता को कायम करूँगा ।

सादर नमन ।

Comment by Samar kabeer on April 29, 2018 at 8:11pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग्गज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

मंच पर आपकी सक्रियता ग़ज़ल पोस्ट करने की हद तक है, तरही मुशायरे में भी आप ग़ज़ल दाग़ कर निकल गए,पलट कर भी नहीं देखा,ये तरीक़ा ठीक नहीं है ।

पांचवें शैर के ऊला में 'बे इरादतन' शब्द मुनासिब नहीं,इसे बदलने का प्रयास करें ।

सातवें शैर में 'बेसुमार' को "बेशुमार" कर लें,और 'बटाने' क़ाफ़िया भी ठीक नहीं ।

आख़री शैर पर निलेश जी बता चुके हैं ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 29, 2018 at 7:48pm

वाह आदरणीय त्रिपाठी जी अच्छी ग़ज़ल कही..सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 29, 2018 at 9:19am

आ. नवीन जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है...
अंतिम शेर में   पर और कर आने से तकाबुले रदीफ़ की सूरत बन रही है,,
देखिएगा 
सादर 

कृपया ध्यान दे...

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