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किरदार (लघुकथा) - सुनील वर्मा

आठ साल की एक लड़की घर की चारदीवारी से बाहर खेल रही थी। उसके पिता घर के अंदर से ही उस पर निगाह बनाये हुए थे। रोज इस समय पर एक बहरूपिया वेश बदलकर आता और कॉलोनी के बच्चों के साथ कुछ देर हँसी ठिठोली करके आगे बढ़ जाता था।
दो दिन पहले 'शिवजी' बनकर आया तब बच्चों को आशिर्वाद दे रहा था। तो परसों 'भालू' बनकर उन्हें डरा रहा था। कल तो हद ही कर दी। औरत बनकर आया तो जैसे पूरी तरह किरदार में रम ही गया। बच्चे पहले तो पहचान ही नही पाये। फिर पता चला तो 'बबलू दीदी..बबलू दीदी' कहकर उसके साथ खेलने लगे। कॉलोनी ने शायद उस दिन पहली बार यह जाना कि उसका असली नाम 'बबलू' है।
मगर आज न जाने क्यूँ अभी तक नही आया। इतनी देर तो नही लगाता। लड़की भी बाहर उसी का इंतजार करते हुए खेल रही थी। तभी वह सामने से पैंट शर्ट पहने लंगड़ाकर चलते हुए आता सा दिखा। पास से गुजरा तो चारदीवारी के अंदर बैठे लड़की के पिता ने आवाज़ लगायी "अररे बबलू। आज काम पर नही जा रहा क्या..?"
प्रत्युत्तर में उसकी आवाज़ आयी "भैया जी, बच्ची बाहर अकेली खेल रही है। उसे अंदर बुला लें।"

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 16, 2018 at 3:38pm

आदरणीय सुनील भैया,बहुत बढ़िया लघुकथा कही है आपने , जिसके लिए बधाई स्वीकारें|

Comment by Ajay Tiwari on April 15, 2018 at 6:50pm

आदरणीय सुनील जी,

 \\कथा उसी पूर्वाभास के साथ आगे चलेगी जो की कथा के लिए गलत होगा\\

संस्कृत के साहित्यशात्रियों ने इस तरह के पूर्वाभास को 'बीज' का नाम दिया था और इसे कथा( मूलतः नाटक की कथा) के विकास का जरूरी हिस्सा मानते थे. इसे गुण की तरह लिया जाना चाहिए दोष की तरह नहीं. हाँ अगर स्पष्ट संकेत हो तो यह निश्चित रूप से गलत होगा. 

\\कथा के पात्र का मान 'बबलू' भी मुझे थोड़ा बदलने लायक लगा। क्यूंकि यह एक व्यस्क पात्र को बचपने वाले भाव दे रहा था\\

आपका पात्र जिस वर्ग से है उसमें ऐसे नाम वयस्कों में भी आम है इस लिए 'बबलू ' नाम इस कथा के लिए अस्वाभाविक नहीं लगता.

 

कथा के संशोधित रूप में भी कुछ गलत हो ऐसा नहीं है बस मुझे लगा की अंत को विस्तार देकर आप पाठक के नजरिये से थोड़ा सरलीकृत करने की कोशिश कर रहे है जो जरूरी नहीं है. 

\\विडम्बना देखिये अब 'बच्ची' का नाम सुनकर उसकी मासूमियत के प्रति प्यार कम बल्कि डर पहले आता है।\\

निश्चित रूप से यह त्रासद है कि हमें एक ऐसे समय में जीना है.  

सादर 

Comment by Sunil Verma on April 14, 2018 at 6:28pm

धन्यवाद अजय जी, आपने कथा को इतना मान दिया।
दरअसल इस कथा की शुरआत वाली पंक्तियाँ बदलने का विचार इसलिए आया की जब मैंने कथा को पाठकीय नज़र से पढ़ा तो लगा की पहली ही पंक्ति में आठ साल की बच्ची का जिक्र पढ़ा तो लगा कि मेरे पाठक यही से इस बात का अनुमान लगाने लगेंगे की अंत में इसके साथ जरूर कुछ गलत होगा। और फिर कथा उसी पूर्वाभास के साथ आगे चलेगी जो की कथा के लिए गलत होगा।
विडम्बना देखिये अब 'बच्ची' का नाम सुनकर उसकी मासूमियत के प्रति प्यार कम बल्कि डर पहले आता है।
फिर कथा के पात्र का मान 'बबलू' भी मुझे थोड़ा बदलने लायक लगा। क्यूंकि यह एक व्यस्क पात्र को बचपने वाले भाव दे रहा था।
सादर

Comment by Ajay Tiwari on April 14, 2018 at 5:41pm

आदरणीय सुनील जी,

आपकी कथा ऐसी है कि आनंदवर्धन जैसे ध्वनि के आचार्य अगर जिन्दा होते तो आपको दाद देते. हार्दिक बधाई.

ऐसे विषय प्रस्तुति में प्रायः अखबारी हो जाते है लेकिन आपकी यह कथा इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक सामयिक विषय को सहित्य में रूपांतरित किया जाता है और कैसे एक साहित्यिक कृति अखबारी विवरण से ज्यादा प्रभावी हो जाती है.  

कथा अपने मूलरूप में ही ज्यादा प्रभावी है.उसमे विस्तार कम है और बात कथित नहीं ध्वनित हो तो ही बेहतर है. 

अगर मुझे समकालीन लघुकथाओं का एक प्रतिनिधि संकलन चुनना होता तो इस लघु कथा को अनिवार्य रूप से सामिल करता.

सादर 

Comment by Sunil Verma on April 14, 2018 at 11:43am

आप शायद कथा को किसी और विषय पर ले गए। मैंने कथा को दोबारा सम्पादित किया है, एक बार देखिएगा...

० किरदार ०

वो बहरूपिया रोज इस गली में नियत समय पर आता था। हर दिन एक नया भेस धरे। कॉलोनी के बच्चों के साथ कुछ देर हँसी ठिठोली करता फिर आगे बढ़ जाता।

कुछ दिन पहले 'शिवजी' बनकर आया तब बच्चों को आशिर्वाद दे रहा था। ‘हनुमान’ बना तो सारे बच्चे वानर सेना बन उसके इर्द गिर्द उछलने कूदने लगे। फिर परसों 'भालू' बन आया और बच्चों के इशारों पर खूब नाचा।

लेकिन असली कमाल तो उसने कल दिखाया। औरत का भेष धर कर आया था वो। अपने किरदार में इस कदर डूबा हुआ कि बच्चे तो बच्चे बड़े भी चकमा खा गए। पहले तो पहचान ही नही पाये फिर जब स्वयं उसने स्त्रियोचित अदा दिखाते हुए अपनी पहचान उजागर की तो बच्चे खुशी से “दीदी...दीदी” चिल्लाते हुए उसकी गोद में चढ़ने की होड़ मचाने लगे।

मगर आज न जाने क्यूँ वह अभी तक नही आया था। इतनी देर तो कभी नही लगाता। बच्चे अनमने से खेलते रहे और बड़ी बेसब्री से उसका देर तक इंतज़ार करते रहे।

डगमगाते कदमों के साथ शरीर पर खरोंचों के निशान लिए जब उसने गली में प्रवेश किया तब तक सारे बच्चे निराश होकर अपने-अपने घर जा चुके थे। सुनसान गली में बस एक छोटी सी बच्ची अपने में मगन अकेली खेल रही थी।

घर के बरामदे में बैठे उस बच्ची के पिता ने उसे देखकर पूछा -”क्यूँ भाई..आज ये पैंट शर्ट में कैसे ? आज 'तमाशे' करने नही जायेगा क्या ?”

सवाल को अनसुना करते हुए वह सिर्फ इतना ही बोल पाया "भैया जी, यह बच्ची घर से बाहर अकेली खेल रही है। उसे कहिये कि घर के अंदर ही खेल ले।"

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 14, 2018 at 11:40am

अच्छी लघुकथा है भाई सुनील जी लेकिन लघुकथा की जान पंच लाइन नहीं है ..
एक   सुझाव है ..
अंत में यह लाइन हो सके तो ऐड कर लें..
" लंगडाकर चलता हुआ बबलू आज शायद सरकार का किरदार निभा रहा था"

Comment by Samar kabeer on April 13, 2018 at 6:36pm

जनाब सुनील वर्मा साहिब आदाब, बढ़िया लघुकथा,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 13, 2018 at 3:54pm

समसामयिक घटनाचक्र से कथानक लेकर बहुत भावपूर्ण मार्मिक रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सुनील वर्मा साहिब।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 13, 2018 at 10:50am

आदरणीय सुनील वर्मा जी, नमस्कार । हृदय स्पर्शी लघु कथा की प्रस्तुति पर बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 13, 2018 at 10:12am

बहुत ही समसामयिक एवम हृदय स्पर्शी लघुकथा।हार्दिक बधाई सुनील जी।

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