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वो चाँद, सितारे कहाँ गए- गजल

मापनी 221 2121 1221  212

 

आँगन, वो’ छत, वो’ चाँद, सितारे कहाँ गए.

वो दिल की’ हसरतों के’ शरारे कहाँ गए.

 

निश्छल सरल वो’ प्रेम के’ किस्से पले जहाँ,

पनघट, नदी  वो’ झील किनारे  कहाँ गए.

 

आये थे’ जिन्दगी में दिखाने को’ रास्ता,

नींदें चुरा के’ ख्वाब तुम्हारे, कहाँ गए.

 

चारों तरफ गुबार है’ नफरत की’ धूल का,

उड़ते  थे’ प्रेम  के वो’ गुबारे कहाँ गए.

 

जब आयी’ गम की’ रात अँधेरा पसर गया,

मनमीत  थे कभी  जो’ हमारे, कहाँ गए.

 

जब से मिला है’ तख़्त दिखाई न शक्ल दी,

वादों  की’ पोटली  वो’ पिटारे कहाँ गए.

 

चौपाल, नीम, आम, बुजुर्गों से’ मशविरा,

मिलते थे’ सब गले वो'  नजारे कहाँ गए.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 22, 2018 at 9:51am

दिली शुक्रिया आपका आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी एवं आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 22, 2018 at 7:47am

आ. भाई बसंत जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on March 22, 2018 at 5:55am

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने। इस ग़ज़ल पर दिली मुबारकबाद। सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 21, 2018 at 6:12pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आपका दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 21, 2018 at 6:11pm

जी आदरणीय Tasdiq Ahmed Khan साहब, ज्ञान में वृद्धि हुई, दिल से शुक्रिया आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 21, 2018 at 6:09pm

जी आदरणीय  Samar kabeer जी , आपका दिल से शुक्रिया, बाकी सुझावों के 

अनुसार परिमार्जन कर दिया है.

Comment by Samar kabeer on March 21, 2018 at 6:02pm

जनाब तस्दीक़ साहिब का कहना दुरुस्त है,"ग़ुबारे" ही रहने दें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 21, 2018 at 5:16pm

वाह आदरणीय शर्मा जी..बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही..सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 21, 2018 at 4:48pm

जनाब बसंत साहिब , गुबारा उर्दू में कहते हैं और गुब्बारा हिन्दी में ---सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on March 21, 2018 at 3:43pm

आदरणीय Tasdiq Ahmed Khan जी आपकी हौसलाअफजाई का दिल से शुक्रिया. जी बिलकुल ठीक है 

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