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'दिल में हमारे दर्द-ए- महब्बत रखा गया'

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन

(हुस्न-ए-मतला और उसके बाद का शे'र क़ित'अ बन्द हैं)

जब इम्तिहान-ए-शौक़-ए- शहादत रखा गया

इनआम उसका दोस्तो जन्नत रखा गया

पहले तो इसमें नूर-ए-सदाक़त रखा गया

फिर इसके बाद जज़्ब-ए- उल्फ़त रखा गया

तकलीफ़ दूसरों की समझ पाएँ इसलिये

दिल में हमारे दर्द-ए-महब्बत रखा गया

कोई भी शय फ़ुज़ूल नहीं इस जहान में

हर एक शय को हस्ब-ए-ज़रूरत रखा गया

लेता नहीं है रोज़ वो आमाल का हिसाब

ये फैसला तो रोज़-ए-क़यामत रखा गया

अह्ल-ए-वफ़ा तो एक भी आया नहीं नज़र

बस्ती में जब भी जश्न-ए-महब्बत रखा गया

हम रहरवान-ए-शौक़ की राहों में ऐ "समर"

दरया रखा गया कभी पर्बत रखा गया

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on March 7, 2018 at 10:36am

जनाब आमोद बिंदौरी साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए शुक्रगुज़ार हूँ ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 27, 2018 at 7:55pm

आद0 आली जनाब समर साहब सादर प्रणाम। बहुत बेहतरीन ग़ज़ल, वाह वाह। कितनी खूबसूरती से आप बातों को शैर के जरिये कह जाते हैं। ग़ज़ज़्ब।

बहुतपहले तो इसमें नूर-ए-सदाक़त रखा गया

फिर इसके बाद जज़्ब-ए- उल्फ़त रखा गया

तकलीफ़ दूसरों की समझ पाएँ इसलिये

दिल में हमारे दर्द-ए-महब्बत रखा गया 

बहुत मुबारकबाद आपको इस ग़ज़ल पर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 27, 2018 at 1:31pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन ।बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by TEJ VEER SINGH on February 26, 2018 at 5:02pm

हार्दिक बधाई आदरणीय समर क़बीर साहब जी।आदाब।बेहतरीन गज़ल।

लेता नहीं है रोज़ वो आमाल का हिसाब

ये फैसला तो रोज़-ए-क़यामत रखा गया

Comment by Harash Mahajan on February 26, 2018 at 2:58pm

आदरणीय समर कबीर जी आदाब,

बहुत ही उम्दा और उच्व भाव सर । हर शेर दिल की छू गया । बेहतरीन ।

सादर

Comment by Naveen Mani Tripathi on February 26, 2018 at 11:28am

वाह वाह वाह क्या खूब ग़ज़ल हुई ।

बस्ती में जब भी जश्ने मुहब्बत रखा गया ।नमन है आपकी कलम को ।बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली मुबारक़वाद ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on February 26, 2018 at 11:27am

वाह वाह वाह क्या खूब ग़ज़ल हुई ।

बस्ती में जब भी जश्ने मुहब्बत रखा गया ।नमन है आपकी कलम को ।बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिली मुबारक़वाद ।

Comment by Mohammed Arif on February 26, 2018 at 8:03am

पहले तो इसमें नूर-ए-सदाक़त रखा गया

फिर इसके बाद जज़्ब-ए- उल्फ़त रखा गया

तकलीफ़ दूसरों की समझ पाएँ इसलिये

दिल में हमारे दर्द-ए-महब्बत रखा गया वाह! वाह! क्या कहने । बहुत उम्दा क़िताबंद शे'र ।

शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारबाद क़ुबूल कीजिए आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ।

Comment by प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप' on February 26, 2018 at 12:13am

वाह! जनाब समर साहिब 

बेहतरीन ग़ज़ल हुई, मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 25, 2018 at 5:04pm

मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब, उम्दा ग़ज़ल हुई है ,शेर दर शेर मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं । शेर3 के उला मिसरे में शायद पाएं की जगह पाए होना चाहिए ,टाइप त्रुटि हो गई ।

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