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ग़ज़ल-ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

काफिया :अन ; रदीफ़ : को

बहर : १२२२  १२२२  १२२२  १२२२

अलग अलग बात करते सब, नहीं जाने ये' जीवन को

ये'  माया मोह का  चक्कर है’ कैसे काटे’ बंधन को|

किए  आईना’दारी मुग्ध  नारी जाति  को जग में

नयन मुख के  सजावट  बीच भूले  नारी’ कंगन को |

सुधा रस  फूल का पीने दो’ अलि  को पर कली को छोड़

कली को नाश कर अब क्यों उजाड़ो पुष्प गुलशन को|

बदी की है वही जिसके लिए हमने दुआ माँगी

न ईश्वर दोस्त ऐसे दे मुझे या मेरे दुश्मन को |

निगाह तेरी बड़ी पैनी  मेरे  दिल  छेद डाली है

जिगर  है खूंचकाँ मेरे सँभालो नज्र सोजन को |

धरा पर है अभी फिर आसमां पर है, ये' मन चंचल

 नियंत्रण  करना’ है मुश्किल बड़ा मन तीव्र तौसन को |

नया  मौसम नया  दस्ता  नया है खेत खलिहान आज

कभी  हम देखते हैं खेत फिर आबाद खिरमन को |

लुटेरा और नेता कर्म से तो एक जैसे हैं

भले दो नेता’ को गाली, दुआ ही देना’ रहजन को

|

घटा छाया दिवाकर भी, छुपा सावन बहुत रोया

सुनाए ना सुने  ‘काली’ हरी चूड़ियों की’ खनखन को |

 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by vijay nikore on January 28, 2018 at 2:39pm

इस अच्छी गज़ल के लिए हार्दिक बधाई, आ० काली प्रसाद जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 28, 2018 at 2:32pm

सुंदर गजल, हार्दिक बधाई ।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 27, 2018 at 10:25pm

हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया आ ब्रजेश कुमार जी |सादर 

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 27, 2018 at 10:21pm

हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया आ सलीम रज़ा रेवा जी |आदाब  

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 27, 2018 at 10:20pm

हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया आ मोहम्मद आरिफ जी | आदाब 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 26, 2018 at 4:24pm

अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय...

Comment by SALIM RAZA REWA on January 24, 2018 at 10:47pm
आ. काली प्रसाद जी,
हिन्दी में बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है मुबारक़बाद कुबूल करें.
Comment by Mohammed Arif on January 24, 2018 at 7:45am

आदरणीय कालीपद प्रसाद जी आदाब,

                                 बहुत ही प्यारी हिंदी-उर्दू शब्दों के संयोजन से बनी ग़ज़ल । हर शे'र कुछ कहता है । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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