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शक्करपारे (लघुकथा) -सुनील वर्मी

"हैलो, भैया यहाँ मूर्ति चौक पर एक भयानक एक्सीडेंट हो गया है| आप जल्दी आईये|" शहर की आपातकालीन सेवा के नम्बर पर एक फोन आया|
संबंधित निर्देश मिलते ही चालक ने एंबुलेंस स्टार्ट की, तभी उसका मोबाईल बजा|
"सुनो, मुनिया को बहुत तेज़ बुखार है|" फोन उठाने पर दूसरी तरफ से उसकी पत्नी का स्वर आया|
"अभी रूको, मुझे थोड़ा समय लगेगा| एक एमरजेंसी है, तुम तब तक मुनिया के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी करो| मैं समय मिलते ही आता हूँ|"
फोन रखकर उसने गाड़ी को कुछ आगे बढ़ाया ही था कि पास बैठे सहायक ने कहा "विभाग से एक और फोन कॉल आया है, इसी रूट से एक प्रसूता को हॉस्पीटल भी ले जाना है|"
"तुम ऑफिस में कहो कि वहाँ किसी दूसरे चालक को जाने के लिए कहे| हमें पहले जल्दी से जल्दी मूर्ति चौक पहुँचना होगा|"
नियत समय पर मूर्ति चौक पहुँचने पर वहाँ परिस्थिति समान्य दिखी तो उसने आसपास पूछताछ की| पता चला कि किसी ने सिर्फ मज़ाक करने के लिए यह फोन किया था|
चालक ने एक गहरी साँस छोड़ी और विभाग में फोन करके कहा कि अगर प्रसूता वाला केस होल्ड पर है तो उसे उसके घर का पता दे दे|
पता मिलते ही वह प्रसूता के घर पहुँचा| अपेक्षित समय से देरी हो जाने के कारण वहाँ खड़े परिजन चालक से गाली गलौज पर उतर आये|
उनकी बातों को अनसुना करके वह प्रसूता को गाड़ी के अन्दर लेटाने में सहायता करने लगा| महिला के चेहरे पर दर्द पढ़ते ही उसे 'आपातकालीन नम्बरों' पर अक्सर फर्जी कॉल करने वालों पर गुस्सा आया| संयम रखते हुए सब कुछ व्यवस्थित करके वह चालक सीट पर बैठा ही था कि फिर से उसका फोन बजा|
"सुनो, मुनिया का बुखार कम ही नही हो रहा| आप आ रहे हो न..."
"हम्मम" कहकर उसने स्टेयरिंग के सामने लगी अपने परिवार की टेढ़ी हो रही तस्वीर को सीधा किया| फोन रखा और सायरन बजाते हुए गाड़ी को महिला हस्पताल की तरफ घुमा दिया|

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on January 23, 2018 at 7:52pm

निश्चित ही ऐसे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति शक्करपारे की तरह होते हैं. उम्दा लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए आ सुनील जी. सादर.

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 21, 2018 at 10:41am

लेखक नाम में वर्मा की जगह ' वर्मी' टंकित हो गया है।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 21, 2018 at 10:40am

वाह। बेहतरीन उम्दा प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब सुनील वर्मा साहिब। बुखार से पीड़ित बच्ची को अटैंड करने के लिए उसके पास उसकी मां है ही। जन्म लेने वाले बच्चे और जच्चा-बच्चा दोनों के प्रति अपने दायित्व निभाते कर्त्तव्यनिष्ठ कर्मचारी के सकारात्मक रवैए के बीच मज़ाकिया फोन करने वालों के कारण होने वाली परेशानियों सहित बहुत सी बातें सम्प्रेषित हुई हैं रचना में। सामाजिक चेतना की, आंखें खोलने वाली बढ़िया रचना।

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