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" जी , आपका परिचय ?"
" मुझे 'धर्मनिरपेक्षता' कहते हैं ।"
" बहुत ख़ूब ! आपके साथ ये कौन है ?"
" ये मेरी बड़ी बहन ' राष्ट्रीयता ' है ।"
" लेकिन आपने अपना परिचय नहीं दिया , आप कौन ?"
" मेरा कोई एक परिचय हो तो दूँ । फिर भी कुछ लोग मुझे वादे , नारे , भाषण-राशन , बयानबाज़ी , आशीर्वाद की भूखी 'राजनीति' कहते हैं ।"
राष्ट्रीयता तिलमिलाकर बोली-" सीधे-सीधे क्यों नहीं कहती कि मुझे 'चरित्रहीन' कहते हैं ।"
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by SALIM RAZA REWA on November 5, 2017 at 4:40pm
जनाब आरिफ साहब,
लघुकथा के लिए मुबारक़बाद.
Comment by Dr. Vijai Shanker on November 5, 2017 at 11:03am
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी , बात सिर्फ इतनी सी है कि सिर्फ शब्दों से बात नहीं बनती। एक एक शब्द जो हम व्यवस्था के नाम पर अपनाते हैं उनका हमें सही सही अर्थ मालूम होना चाहिये और उसका प्रयोग उसके सही अर्थ में ही होना चाहिए। शब्द हमारी इच्छा के अनुसार अपने मतलब नहीं बदलते हैं , हमारी यह कोशिश , हो सकता है , कुछ समय के लिए कामयाब हो जाए पर सदैव सफल होगी , संभव नहीं है। हम अभी तक आज़ादी / स्वतंत्रता / स्वाधीनता / स्वेच्छाचारिता को तो सही सही समझ नहीं पाए। अभी भी अक्सर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में गण्यमान लोग अंतर नहीं कर पाते हैं , धर्मनिरपेक्षता तो कुछ और ही जटिल शब्द है। .... और फिर जब कोई भी शब्द राजनीति में प्रयोग होने लगता है तो उसकी व्यख्या आवश्यकतानुसार बदलती रहती है। हमारे सामने तो सबसे बड़ी चुनौती अभी " लोकतंत्र " ही है , जितने लोगों से मिलिएगा उतने अर्थ मिल जायेगे। वैसे इतिहास के पैन पलटें तो उन्नीसवीं शताब्दी में ही नेपोलियन का सेकुलरिज्म , इंग्लैंड के राजपरिवार का सेक्लारिस्म और आगे आठवें दशक में जर्मनी के बिस्मार्क का सेकुलरिज्म सब एक दूसरे से न्यूनाधिक भिन्न थे। आपके प्रयास और लघु-कथा पर आपको बधाई , सादर।
Comment by Mohammed Arif on November 4, 2017 at 8:11pm
आपकी टिप्पणी से लेखन सार्थक हो गया । बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 4, 2017 at 7:59pm
आपकी एक और सधी हुई कटाक्षपूर्ण बेहतरीन लघुकथा। सादर हार्दिक बधाई और शुभकामनायें आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब।
Comment by Mohammed Arif on November 4, 2017 at 5:57pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय मोहित जी ।

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