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कविता...​​ बदले हुये इंसान की बातें -बृजेश कुमार 'ब्रज'

सुबह से लेकर सांझ की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ
सूरज से लेकर चांद की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ

कैसे लिख दूँ मैं भँवरे का
कलियों से हुआ जो प्रेम मिलन
कैसे लिख दूँ कि बेलों ने
पेड़ों को बाँधा था आलिंगन
प्रीत पतिंगा दिए से करे
पगले के बलिदान की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ
जीवन और शमशान की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ

कैसे लिख दूँ की तुम बिन
उदास आँखों का दरपन
रूठी ​​हुई बहारें हैं
उजड़ा हुआ है मन-उपवन
अपनी आँखों के आँसू को
कर दूँ कैसे तुमको अरपन
नैनों से बरसते निर्झर को
इक खत में कैसे लिख दूँ
सांझ ढले जब दीप जले आ जाओ
दिल के इस अरमान की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ

​​कैसे लिख दूँ मैं कुंज गलियों की
बोझिल होती नीरवता
किन शब्दों में बयां करूँ
सुरसरि की खोई निर्मलता
उसके दर्द उफान की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ
बदले हुए इनसान की बातें
इक खत में कैसे लिख दूँ
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2017 at 9:49pm
बहुत बहुत आभार आदरणीय सलीम जी..
Comment by SALIM RAZA REWA on November 1, 2017 at 8:38pm

भाई बृजेश कुमार 'ब्रज' जी खूबसूरत कविता के लिए बधाई। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2017 at 7:34pm
आदरणीय समर कबीर जी आपके स्नेह के लिये हार्दिक अभिनन्दन वंदन..जहाँ तक मेरी जानकारी है दर्पण और दर्पन लिखने में प्रयुक्त किये जा सकते हैं..हालाँकि मैंने दरपन लिखा है जो उचित नहीं है..सादर
Comment by Samar kabeer on November 1, 2017 at 5:03pm
जनाब बृजेश कुमार'ब्रज'साहिब आदाब,बहुत उम्दा कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
दरपन-दर्पण
अरपन-अर्पण ?
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 31, 2017 at 10:17pm
आदरणीय डा.साहब आपके सुन्दर शब्दों से अतिप्रसन्ता का अहसास हुआ..हार्दिक अभिनन्दन वंदन..सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 31, 2017 at 7:00pm
आदरणीय भाई बृजेश जी ख़त में कैसे लिखेंगे ये तो नहीं पता पर इस रचना रूपी सुराही में आपने समंदर जरूर उड़ेल दिया। पढ़ने में रिचक लगी इस रचना पर आपको ढेर सारी बधाई सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 31, 2017 at 4:19pm
आपकी उत्साहवर्धक टिप्पड़ी के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय मोहित जी..

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