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ग़ज़ल (आ गये सिमट के)

फइलात -फ़ाइलातुन -फइलात -फ़ाइलातुन


सरे राह उसने देखा जो मुझे पलट पलट के |
उसी दिन से रह गया हूँ मैं मुआशरे से कटके |

अभी रूठ कर उठे थे कि कड़क के बर्क़ चमकी
मेरी बाहों में वो सहमे हुए आ गये सिमट के |

बड़ी रात जा चुकी है कोई ख़ाक आएगा अब
शबे ग़म मेरी इधर आ तुझे रो लूँ मैं लिपट के |

जो ग़रीब हौसला है उसे होगा कुछ न हासिल
वही जाम पा सकेगा जो उठा ले ख़ुद झपट के |

जिन्हें गुमरही का डर था वही पा गये हैं मंज़िल
जिन्हें ज़ोमे आगही था वही कारवाँ हैं भटके |

मेरे साथ गामज़न है मेरा गर्दिशे मुक़द्दर
मेरे हमसफ़र तू चलना ज़रा दूर मुझ से हटके |

जिन्हें सुनके दोस्तों ने दी थी ख़ूब दाद तस्दीक़
वही शेर बे तहाशा मेरे नाक़दो को खटके |

मुआशरा--- समाज , गुम रही --भटकने
ज़ोम --गुमान , आगही--जानकारी
नाक़िद --तन्क़ीद करने वाले

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Ajay Tiwari on October 18, 2017 at 6:43am

आदरणीय तस्दीक साहब,

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है. शुभकामनाएं.

सादर 

Comment by दिनेश कुमार on October 18, 2017 at 3:49am
बहुत उम्दा ग़ज़ल लगी मुहतरम तस्दीक़ साहब। वाह वाह
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 17, 2017 at 9:51pm
जनाब सलीम साहिब ,ज़्यादा मसरूफियत की वजह से ऐसा हो रहा है ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 17, 2017 at 9:49pm
जनाब राम अवध साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 17, 2017 at 9:47pm
जनाब संतोष साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on October 17, 2017 at 9:16pm
जनाब तस्दीक साहिब,
मेरी ग़ज़लों को आपकी महब्बत नहीं मिल रही है.
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 17, 2017 at 9:04pm
आदरणीय, लाज़बाब शेर कहे हैं मुबारक हो।
Comment by santosh khirwadkar on October 17, 2017 at 7:05pm

आदरणीय तस्दीक़ साहब, बहुत शानदार ग़ज़ल कही...... बधाई स्वीकारें !!!

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 17, 2017 at 6:45pm
जनाब सलीम साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on October 17, 2017 at 6:25pm
जनाब तस्दीक़ साहब,
ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद...
रदीफ़ के लिए खासतौर पर..

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