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सूत्र और सूत्रधार (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"छोटा सा काम हो या बड़ा, छोटा लक्ष्य हो या बड़ा; कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले सूत्र चाहिए, जुगाड़ चाहिए, बस!"
"हां, सूत्र से सूत्र मिलते हैं, कड़ी से कड़ी जुड़ती है, तभी मंज़िल का रास्ता तय होता है!"
इन दोनों की बातें सुनकर तीसरे व्यक्ति ने कहा- "लेकिन मेरे तो यही सूत्र हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, इसकी टोपी उसके सर और उंगली पकड़कर कर पौंछा पकड़ना!"
यह सुनकर चौथा व्यक्ति अपना सीना तान कर खड़ा हुआ और बोला- "इनमें मेरी सफलता के सूत्र भी जोड़ दो। छोटा हो या बड़ा; चपरासी हो या अफ़सर, उसकी कमियों को पकड़ कर शुरू से ही उस पर हावी हो जाओ। ज़रूरत होने पर जूती भी चाटो या पहनाओ और बहुत ज़रूरी हो जाये, तो जूते भी बरसाओ!"
"बिल्कुल सही! जब सब अपने साथ ऐसा ही कर रहे हैं तो हम क्यों न करें!" सब साथी एक सुर में बोले।
"जंज़ीरों और उनकी कड़ियों की परिभाषाएं बदल चुकी हैं!" उनमें से एक ने धीरे से कहा।
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on September 25, 2017 at 4:19am

बहुत खूबसूरत लघुकथा कही है। हार्दिक बधाई, आदरणीय शेख शज़ाद उस्मानी जी।

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2017 at 2:16am
आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी , जीवन में काम निकालने के सूत्र ( फार्मूले ) बदलते रहते हैं पर इस प्रकार की स्थिति , बातें एवं तर्क शिक्षा और संस्कार दोनों का अभाव संकेतित करता है। सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई , सादर।
Comment by SALIM RAZA REWA on September 24, 2017 at 12:09pm
जनाब शेख शहज़ाद उस्मानी साहब आदाब,
मुहावरों से सजी बेहतरीन लघुकथा के लिए मुबारक़बाद,
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 24, 2017 at 11:01am
रचना पर त्वरित टिप्पणी, अनुमोदन व हौसला अफज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब।
Comment by Mohammed Arif on September 24, 2017 at 10:58am
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब, अच्छा कथानक,बेहतरीन तंज़ कसा आपने । बधाई स्वीकार करें ।

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