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ग़ज़ल-नूर की - इस तरह हर इक गुनह का सामना करना पड़ा,

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 
.
इस तरह हर इक गुनह का सामना करना पड़ा,
हश्र में ख़ुद के किये पे तब्सिरा करना पड़ा.
.
सुल्ह फिर अपने ही दिल से यूँ हमें करनी पड़ी,
फ़ैसले को टालने का फ़ैसला करना पड़ा. 
.
क़ामयाबी की ख़ुशी में चीखता है इक मलाल,
सोच कर निकले थे क्या कुछ और क्या करना पड़ा.
.
एक मुद्दत से कई चेहरे थे आँखों में असीर,
आँसुओं की शक्ल में सब को रिहा करना पड़ा.
.
झूठ के नक्क़ारखाने में बला का शोर है,
सच की शहनाई को सुन कर अनसुना करना पड़ा.
.
आ गया था एक बार उस की तिलस्मी बातों में, 
ज़ह’न को फिर उम्र भर दिल का कहा करना पड़ा. 
.
इन की ख्वाहिश हम न समझेंगे तो फिर समझेगा कौन
पाँओं को काँटो की ख़ातिर बरहना करना पड़ा.
.
जब सभी पत्थर ख़ुदा होने पे आमादा मिले,

“नूर” ख़ुद को पत्थरों में आइना करना पड़ा.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by rajesh kumari on April 6, 2017 at 10:50am

एक मुद्दत से कई चेहरे थे आँखों में असीर, 
आँसुओं की शक्ल में सब को रिहा करना पड़ा. -------क्या कहने जबरदस्त कहन 

जब सभी पत्थर ख़ुदा होने पे आमादा मिले, 
“नूर” ख़ुद को पत्थरों में आइना करना पड़ा.-----वाह्ह्ह्हह्ह 

वैसे सभी शेर बढ़िया हुए किन्तु इन दो को तो कई बार पढ़ चुकी हूँ 

इस शानदार ग़ज़ल के लिए दिल से दाद क़ुबूल करें नीलेश भैया 
.

.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 6, 2017 at 8:18am

शुक्रिया आ. अनुराग जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 6, 2017 at 8:18am

शुक्रिया आ. तस्दीक़ साहब 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 5, 2017 at 10:15pm

मुहतरम जनाब नीलेश साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद
क़ुबूल फरमाएँ ---

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2017 at 10:15pm

शुक्रिया आ. समर सर ...

Comment by Samar kabeer on April 5, 2017 at 6:17pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,बहुत उम्दा और मुरस्सा ग़ज़ल कही आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 5, 2017 at 1:37pm

आ. गुरप्रीत जी....
धन्यवाद ...
आप पुरानी ग़ज़लें पढ़ रहे हैं तो उन में यदि कोई कमी लगे तो अवश्य बतायें... मुझे ख़ुशी होगी क्यूँ की सीखने की  प्रक्रिया में   गलतियाँ होंना सामान्य बात  है .
आभार 

Comment by Gurpreet Singh jammu on April 5, 2017 at 1:31pm

आदरणीय नीलेश जी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल है..

एक मुद्दत से कई चेहरे थे आँखों में असीर,
आँसुओं की शक्ल में सब को रिहा करना पड़ा.

वाह वाह क्या बात है सर,, बाकी अशआर लाजवाब भी हैं..

नीलेश सर जी आज कल आप की ओ बी ओ पर पुरानी ग़ज़लें पढ़ रहा हूँ..खूब मज़ा आ रहा है... हरेक ग़ज़ल पर अपनी ग़ज़ल कहने को मन ककर रहा है..

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