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ना जाने दिल क्यों खोजता है (कविता):- मोहित मुक्त

ना जाने दिल क्यों ढूंढता है|

वो खुशबु तेरे बालों की,
वो लाली तेरे गालों की,
दृग कजरारे तेज कटार से ,
लब पगे है जो रसधार से,
चंचल मीठी मुस्कान को ,
ज्यो साधु खोजे भगवन को ,
तुम ईष्ट हो या प्रेयसी,
मन दो पल रुक से सोचता है|
ना जाने दिल क्यों ढूंढता है|

वो लम्हे कितने प्यारे थे,
आप जो साथ हमारे थे,
थोड़ी बहुत ख़ामोशी थी,
बस पत्तों की सरगोशी थी,
जब सांसे अपनी टकराती थी,
क्या अदा से तुम शर्माती थी,
तब मस्त हो बरसा था सावन ,
हो उन्मुक्त हंसा था जैसे गगन ,
हंस के खिले थे बसंती फूल ,
मखमल जैसे बन गए थे शूल ,
जाने पतझङ फिर क्यों आया,
मन दो पल रूक ये सोचता है|
ना जाने दिल क्यों ढूंढता है|

क्यूँ लम्हे ना थम जाते हैं?
क्यूँ वापस लौट ना आते हैं?
क्यूँ खोता है प्यार यहाँ ?
क्यूँ लुटता है संसार यहाँ?
क्यूँ दर्द दिलों में होता है ?
क्यूँ कोई अपना खोता है ?
क्यूँ रूह दीवानी हो जाये ?
क्यूँ साँस बेगानी हो जाये?
क्यूँ पागल दिल मचलता है?
क्यूँ अधूरापन सा खलता है?
तुम छोड़ मुझे क्यों चली गयीं?
मन दो पल रुक से सोचता है |
ना जाने दिल क्यों ढूंढता है|
ना जाने दिल क्यों ढूंढता है...


;-मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Mohit mukt on Tuesday

आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी रचनावलोकन और प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on Tuesday

आदरनीय मोहित भाई , अच्छी भाव पूर्ण कविता रची है .... हार्दिक बधाई ।

Comment by Mohit mukt on Monday

आदरणीय सतविंद्र जी रचना पढ़ने और उत्साह वर्धन के लिए  धन्यवाद् 

Comment by सतविन्द्र कुमार on Monday
हारदिक बधाई आदरणीय मोहित मुक्त जी,इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए
Comment by Mohit mukt on Monday

माननीय  Sheikh Shahzad Usmani जी प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 19, 2017 at 3:30pm
जज़्बात के सवालात कविता के माध्यम से! बहुत सुंदर रचना हेतु सादर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ आपको आदरणीय मोहित मुक्त जी।
Comment by Mohit mukt on March 18, 2017 at 6:51pm

माननीय आरिफ जी उत्साह वर्धन के लिए शुक्रिया | आपकी बात का ख्याल रखूँगा सदर 

Comment by Mohammed Arif on March 18, 2017 at 6:38pm
आदरणीय मोहित मुक्त जी आदाब, आपकी ओबीओ पर पहली रचना से परिचित हो रहा हूँ , आपके प्रयास की जितनी प्रशंसा की जाय कम है । आपकी रचना प्रेम के रंग से सराबोर है । सुंदर भावों की बगिया खिली है । सभी पुष्प अपनी महक और छटा बिखेर। रहे हैं । काश, आपके ये भाव किसी गीत या ग़ज़ल में आबद्ध होते तो रचना में निखार आ जाता । ख़ैर आपका प्रयास अच्छा है । बधाई स्वीकार करें ।

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