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ख़्वाब का माहताब ....

ख़्वाब का माहताब ....

तुम्हारे
अंधेरों में
मेरे हिस्से के
उजाले
तुम्हारी मुहब्बत की
गिरफ़्त में
बे-आवाज़
सिसकते रहे

और तुम
मेरी चश्म से
शीरीं शहद से
लम्हों को
कतरों में समेटे
बहते रहे

मेरा ज़िस्म
तुम्हारे लम्स
की हज़ारों
खुशबुओं के  
कफ़स में
सांस लेता रहा

आफ़ताब की शरर ने
उम्मीद की दहलीज़ को
हक़ीक़त की
आतिश से
ख़ाक में
तब्दील कर दिया

किसी के
इंतज़ार को
बुझते हुए दिए ने
अंधेरों का
अंजाम दे दिया

पलकों की चिलमन
रूहानी माहताब  की
मुन्तज़िर हो गई

वक्त की गर्द में
हसीं लम्हों के शजर 

बेजान होते गए 

तुम दूर से
और दूर होते गए


रूख़सारों पे
अश्कों के निशां
सूखने लगे
तारीकियों के पैराहन में
तदबीर सोने लगी
हर सहर
तेरा इंतज़ार
मेरी शब् का
जवाब बन गई

और
तुम्हारी तमन्ना
मेरे ख़्वाब का
माहताब बन गई

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 6, 2017 at 1:43pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी प्रस्तुति को अपनी स्नेह बरखा से पल्लवित करने का हार्दिक आभार। भविष्य में कठिन उर्दू शब्दों का हिंदी अनुवाद देने का प्रयत्न करूंगा। हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 6, 2017 at 1:38pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी ये मेरा सौभाग्य है की आप जैसे ज्ञानियों के चक्षुओं ने सृजन को आत्मीय मान से सम्मानित किया। आपका हृदय की असीम गहराईयों से हार्दिक आभार। प्रस्तुति आदरणीय समर कबीर जी की मार्गदर्शन के अनुसार पूर्व में ही संशोधित कर दी थी। आपके इस आत्मीय स्नेह का शुक्रिया। 

Comment by Sushil Sarna on January 6, 2017 at 1:35pm

आदरणीय डॉ गोपाल जी भाई साहिब आप जैसे गुणीजनों से मुखारविंद से सृजन को जो मान मिला है उसके लिए मैं हृदयतल से आपका आभारी हूँ। 

Comment by Sushil Sarna on January 6, 2017 at 1:33pm

आदरणीय समर कबीर साहिब आप के दिल से निकले मन मुदित करते अल्फ़ाज़ों ने प्रस्तुति को अमरत्व प्रदान किया है। बन्दा आपका शुक्रगुज़ार है। आपके द्वारा इंगित त्रुटियों को ठीक करके उसे संशोधित रूप में पुनः प्रेषित कर दिया था जो आपके सामने है। आपका ये मार्गदर्शन सदैव मेरे सृजन को जीवंत कर देता है । इस हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया। सदर  .... 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 6, 2017 at 10:03am
आदरणीय सरना जी वाकई कमालकी रचना सुदर भाव साढ़े हुए बेहतरीन शब्दों क प्रयोग दो तीन बार पढ़ा इस रचना को उर्दू जे शब्दों के अर्थ भी लिखने का आपसे निवेदन कर रहा हूँ थोडा संजना आसान हो जाता है ढेर सारी बधाई के साथ

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 6, 2017 at 1:22am

वाह वाह वाह ... आपने क्या खूब नज़्म लिखी है. लाज़वाब. सीधे दिल में उतर गई. दिल खुश कर दिया आपकी प्रस्तुति ने. आदरणीय सुशील सरना सर, इस शानदार प्रस्तुति पर बहुत बहुत बधाई. आदरणीय समर कबीर जी द्वारा साझा किये अनुसार संशोधन पश्चात् नज़्म और भी ज्यादा निखर जायेगी. सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 5, 2017 at 7:56pm

आ० सरना जी . आप जब रंग में होते हैं तो बस रंग में होते हैं . आपकी कविता बहुत ही हसीन  कविता है . सादर .

Comment by Samar kabeer on January 5, 2017 at 2:44pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बेहद जज़्बाती कविता हुई है,एक एक लफ़्ज़ मोती की तरह जड़ दिया है आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
18वीं पंक्ति में"क़फ़स"शब्द पुल्लिंग हे,इसलिये "ख़ुशबुओं की क़फ़स"को"ख़ुशबुओं के क़फ़स"कर लीजियेगा ।
36,37वीं पंक्ति में टाइपिंग मिस्टेक 'शज़र'को "शजर"और 'बेज़ान'को "बेजान'कर लें ।

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