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अक्षय गीत ....

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ
तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ
कुछ भी कहने से डरता  हूँ
पीर हृदय की कह  न  सकूं
बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

शशांक का विरह गीत कहूँ,या रैन की निर्दयी रीत कहूँ
तुम ही बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है. घूंघट  में
अधरों की हाला प्यासी है
स्वप्न नीड़  पर  नयनों  के
पी बिन  घोर  उदासी  है

देह की अतृप्त धड़कन को ,निष्ठुर पलों का संगीत कहूँ
तुम  ही  बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय गीत कहूँ

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on December 25, 2016 at 5:22pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत सुंदर गीत लिखा है आपने,आनन्द आ गया,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mahendra Kumar on December 25, 2016 at 12:24pm
आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत ही प्यारा गीत लिखा है आपने। बहुत-बहुत बधाई। सादर।
Comment by Sushil Sarna on December 24, 2016 at 3:30pm

आदरणीया प्रतिभा जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय प्रशंसा से शोभित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 24, 2016 at 3:29pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति को अमूल्य समय देकर उसे और भी आकर्षित रूप देने का हार्दिक आभार। आपके संशोधन शिरोधार्य हैं। हार्दिक आभार। 

Comment by pratibha pande on December 24, 2016 at 9:19am

बहुत प्यारा गीत.. वाह ..हार्दिक बधाई आपको आदरणीय सुशील जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2016 at 2:07am

आदरणीय सुशील सरना सर, इतना प्यारा गीत है कि ख़ुद को रोक नहीं पाया. बस अपने गुनगुनाने के लिए कुछ संशोधन किये है-

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ 
स्वयं बताओ कैसे प्रिये,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ 
कुछ भी कहने से डरता  हूँ 
मैं पीर हृदय की कह न सका

बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

चन्द्र-विरह का गीत कहूँ या.... रैन की निर्दयी रीत कहूँ 
स्वयं बताओ कैसे प्रिये, मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है घूंघट  में 
अधरों की हाला प्यासी है 
इस स्वप्न नीड़ पर नयनों  के 
प्रियतम बिन घोर उदासी है

संतप्त हृदय की धड़कन को ,निष्ठुर पल का संगीत कहूँ 
स्वयं बताओ कैसे प्रिये, मैं  कोई  अक्षय गीत कहूँ

इस प्रस्तुति पर दिल से ढेर सारी बधाईयाँ दे रहा हूँ. सादर 

Comment by Sushil Sarna on December 23, 2016 at 1:13pm

आदरणीय  आशीष यादवजी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by आशीष यादव on December 23, 2016 at 1:08am
Sundar bhaw sanjoye geet.
Jaag rhi birhan ki preet.
Comment by Sushil Sarna on December 22, 2016 at 8:21pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 22, 2016 at 7:45pm
वाह । बहुत सुन्दर गीत हुआ है आदरणीय । हर पंक्ति लाजवाब है । बधाई स्वीकारें आदरणीय ।

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