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कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

2122/1212/22

चाँद जब भी निकल रहा होगा।
कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

ज़िन्दगी भर न वो रहेगा यूँ,
उस का दिल भी पिघल रहा होगा।

मर्ज़-ए-दिल हम को ही नहीं केवल,
उसका भी दम निकल रहा होगा।

चोट खाने के बाद हम सा ही,
आज वो भी सँभल रहा होगा।

हम को इतना यक़ीं तो है 'रोहित',
हिज़्र में वो भी जल रहा होगा।

रोहिताश्व मिश्रा
फ़र्रुखाबाद
(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Views: 781

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Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 25, 2016 at 6:27pm
बहुत बहुत शुक्रियः आदरणीय।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 6:23pm

आ० रोहिताश्व जी , बहुत बढ़िया.

Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 23, 2016 at 10:17am
बहुत बहुत शुक्रियः
Ashish Bhai Ji
Comment by आशीष यादव on December 23, 2016 at 1:55am
Aadarniy Rohit ji, achchhi ghazal pr badhai swikaren.
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 22, 2016 at 10:11am
बहुत बहुत शुक्रियः सुरेन्द्र भाई जी
Comment by नाथ सोनांचली on December 22, 2016 at 7:48am
आद0 रोहिताश्व मिश्र जी सादर अभिवादन, अच्छी गजल कही आपने, दाद के साथ मुबारकबाद हाजिर हैं।
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 21, 2016 at 8:49pm
शुक्रियः कल्पना दीदी
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 21, 2016 at 8:21pm
अच्छी ग़ज़ल आदरणीय । बधाई स्वीकारें ।
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 21, 2016 at 8:12pm
Shukriyh Brajesh Bhai Ji
Comment by रोहिताश्व मिश्रा on December 21, 2016 at 8:11pm
THANKU Samar Bhai Ji

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