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ग़ज़ल - तफ़्सील में गये तो वो ख़ुद से ख़फ़ा मिले ( गिरिराज भंडारी )

221 2121   1221   212 

जो खोजते हैं रोज़ कोई मुद्दआ मिले

तफ़्सील में गये तो वो ख़ुद से ख़फ़ा मिले

 

नफरत मिली है देखिये नफरत से इस तरह  

मजबूरियों में तेल ज्यूँ पानी से जा मिले

 

हारे हुए मिलेंगे जहाँ खार कुछ तुम्हें
मुमकिन है उस जगह से मिरा भी पता मिले"  

 

हम दिल से चाहते हैं उन्हें दाद हो अता 

जो नेवले की जात हो, साँपों से जा मिले

 

बादल बरस के साथ ही ऐलान कर गया

क़िस्मत ही फैसला करे, अब तुझको क्या मिले

 

इंसान ही ज़मीन पे मिल जाये तो बहुत

चाहत नहीं है कोई मुझे देवता मिले

 

हर वक़्त मांगता है वफा , क्या तुझे हुआ ?

ये कौन चाहता है कि उसको गदा मिले

 ************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on December 3, 2016 at 5:53pm

आपकी हर गज़ल बहुत ही शानदार होती है। यह भी ऐसी ही ऊँची गज़ल है। हार्दिक बधाई, भाई गिरिराज जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 3, 2016 at 9:46am

आदरणीय गुरप्रीत भाई , हौसला अफज़ाई का अथे दिल से शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 3, 2016 at 9:46am

आदरणीय महेन्द्र भाई , ग़ज़ल पर उपस्थिति और सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

Comment by Gurpreet Singh jammu on December 3, 2016 at 8:48am
बहुत अच्छी ग़ज़ल आदरणीय गिरिराज जी
Comment by Mahendra Kumar on December 2, 2016 at 7:56pm
बहुत उम्दा ग़ज़ल है आदरणीय गिरिराज सर। हार्दिक बधाई!
Comment by Samar kabeer on December 2, 2016 at 5:35pm
मेरे कहे को मान देने के लिये धन्यवाद ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2016 at 3:37pm

आदरणीय समर भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया -

हारे हुए मिलेंगे जहाँ खार कुछ तुम्हें
मुमकिन है उस जगह से मिरा भी पता मिले"      --   भाव लगभग वही है , ऐसा ही कर लूँगा । आपका फिर से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2016 at 3:30pm

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का बेहद शुक्रिया ।

Comment by Samar kabeer on December 2, 2016 at 2:42pm
फिर नक़्श-पा वाला शैर इस तरह हो सकता है:-
"हारे हुए मिलेंगे जहाँ खार कुछ तुम्हेंन
मुमकिन है उस जगह से मिरा भी पता मिले"
Comment by नाथ सोनांचली on December 2, 2016 at 2:07pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा गजल पढने को आप के जानिब से मिली। ह्रदय से बधाई और दाद कबूल फरमाएं।

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