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सवैये - प्रथम प्रयास

वागीश्वरी सवैया सूत्र : यगण X 7 + ल गा

(1)
कहीं भी कभी भी यहाँ भी वहाँ भी, किसी को किसी का भरोसा नहीं |
यही है ज़माना बताऊँ तुझे क्या, ज़रा भी सलीक़ा नहीं है कहीं |
इसी के लिये तो हमारी वफ़ा ने, जहां में कई यातनाएं सहीं |
बड़ों ने बताया जिसे ढूंढते हो, भरोसा यहीं है मिलेगा यहीं ||

(2)
भलाई हमें तो दिखी है इसी में, कभी भी दुखों में न आहें भरें |
हमारे लिये तो यही है ज़रूरी, यहाँ कर्म अच्छे हमेशा करें |
हमें ये सिखाया गया है कि भाई, हदों को न तोड़ें ख़ुदा से डरें |
किसी हाल में भी न भूलें कभी ये, भले ही जहाँ में जियें या मरें ||

--समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 10, 2019 at 3:33pm

जनाब अनीस शैख़ साहिब आदाब,आपको छन्द पसंद आये,जानकर प्रसन्नता हुई,सराहना के लिए आपको धन्यवाद कहता हूँ ।

Comment by Md. Anis arman on March 10, 2019 at 3:08pm

जनाब समीर कबीर साहब आपकी ग़ज़लें पढ़ते पढ़ते इस छंद में पहुँच गया इसको पढ़ने के बाद मुझे राहत इंदौरी साहब  का शेर याद आ रहा  ,"

फ़क़ीर ,शाह  , कलंदर, इमाम क्या क्या है 

तुझे पता नहीं तेरा ग़ुलाम क्या क्या है |

क्या कहूँ मैं इन सब के लिए तो एक ज़िंदगी कम पड़ जाये पता नहीं कैसे कर  लेते हैं आप, बहुत खूब सर 

Comment by Samar kabeer on December 16, 2016 at 10:02am
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,ये सब ओबीओ का करिश्मा है, मेरा प्रयास आपको पसंद आया लिखना सार्थक हुआ,आपकी दुआएं शामिल रहीं तो धीरे धीरे सभी छन्दों पर प्रयास करने का इरादा रखता हूँ,सराहना और उत्साहवर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 15, 2016 at 7:45pm

वाह्ह्ह्हह वाह्ह्ह्ह आद० समर भाई जी ,वागीश्वरी सवैया ..शिल्प पर इतना सधा हुआ प्रवाह की देखते ही बनता है कहीं से नहीं लगता की आप प्रयास कर रहे हैं गजलों में तो आप माहिर हैं छंदों में भी एक दिन सिद्धस्थ होकर निकलेंगे .मेरी दिल से दुआएँ और मुबारकबाद आपको .

Comment by Samar kabeer on November 4, 2016 at 11:00pm
जनाब विजय निकोर जी आदाब,सवैये आपको पसंद आए ,लिखना सार्थक हुवा,सराहना के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
Comment by vijay nikore on November 4, 2016 at 2:12pm

आदरणीय समर कबीर जी, आपकी प्रस्तुतियां पढ़ कर आनन्द आया ... गहरे भाव, उत्तम संदेश ... जीवन में इनका प्रयोग कितना उपयोगी है ! हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on November 4, 2016 at 10:41am
जनाब अशोक कुमार रक्ताले जी आदाब,आपने मेरे प्रयास की सराहना की बहुत ख़ुशी हासिल हुई और इसके लिए में आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
छन्दों पर मैने जब जब प्रयास किया है आपने मेरा मार्गदर्शन किया है,छोटी छोटी बातें पूछने के लिये मैने बार-बार आपको टेलीफोन से मार्गदर्शन लिया है और आपने हमेशा मेरी हौसला अफजाई के साथ मुझे छन्दों की बारीकियां समझाई हैं,आज में कुछ करने लायक हुआ हूं तो इसमें आपका भी हिस्सा है,में इसे दिल से तस्लीम करता हूँ,और आगे भी आपको परेशान करता रहूंगा पुरे हक़ के साथ,क्योंकि आप तो मेरे घर के ही हैं ।
आपकी सराहना और मार्गदर्शन के लिये सदा आपका आभारी रहूंगा,इस स्नेह के लिये आपको विशेष धन्यवाद कहता हूँ स्वीकार करें ।
Comment by Ashok Kumar Raktale on November 4, 2016 at 9:04am

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, आपको गजलों की महारत के पश्चात छंदों पर कार्य करते देखकर प्रसन्नता हुई है. पहले मात्रिक में दोहा  और अब वार्णिक छंद में सवैया.

        दोनों ही छंद आपने प्रथम बार में ही उत्तम रचे हैं. कहीं भी गण दोष नहीं दिख रहा है यह आपके लेखन में सजगता को दर्शा रहा है. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

Comment by Samar kabeer on November 3, 2016 at 11:44pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,मेरा प्रयास आपको पसंद आया, लिखना सार्थक हुवा, रचना की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ । ये जानकर ख़ुशी हुई कि आप भी सवैये लिखना चाहते हैं,मेरी दुआएँ आपके साथ हैं,आपके सवैये का इन्तिज़ार रहेगा ।
Comment by Samar kabeer on November 3, 2016 at 11:41pm
जनाब बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी आदाब,मेरा प्रयास आपको पसंद आया,मेरा लिखना सार्थक हुवा,सुझाव और रचना की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

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