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जिन्दगी की अलगनी पर शाइरी को साधना (ग़ज़ल)

बह्र : 2122 2122 2122 212

 

कुछ पलों में नष्ट हो जाती युगों की सूचना

चन्द पल में सैकड़ों युग दूर जाती कल्पना

 

स्वप्न है फिर सत्य है फिर है निरर्थकता यहाँ

और ये जीवन उसी में अर्थ कोई ढूँढ़ना

 

हुस्न क्या है एक बारिश जो कभी होती नहीं

इश्क़ उस बरसात में तन और मन का भीगना

 

ग़म ज़ुदाई का है क्या सुलगी हुई सिगरेट है

याद के कड़वे धुँएँ में दिल स्वयं का फूँकना

 

प्रेम और कर्तव्य की दो खूँटियों के बीच में

जिन्दगी की अलगनी पर शाइरी को साधना

-------------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 655

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 29, 2016 at 1:08am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी

Comment by Ravi Shukla on September 19, 2016 at 9:39pm
आदरणीय धर्मेन्द्र जी बहुत अच्छी लगी आपकी गज़ल और इनके बिम्ब बधाई स्वीकार करें
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 19, 2016 at 7:20pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय बृजेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 19, 2016 at 7:19pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 19, 2016 at 7:15pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहब

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 13, 2016 at 2:00pm

वाहह आदरणीय बेहद खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाइयाँ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 11, 2016 at 4:05pm

क्या बात है , आदरनीय धर्मेन्द्र भाई , बढिया गज़ल कही आपने , एक एक शे र कीमती है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।

Comment by Samar kabeer on September 11, 2016 at 3:03pm
जनाब धर्मेंद्र कुमार जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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